इश्क़ – एक जूनून

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Ishq – ak junoon

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“यात्रीगण कृपया ध्यान दे नासिक से पुणे जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आने वाली है”
जैसे ही वैदेही ने स्टेशन पर ये इन्फॉर्मेशन सुनी अपना बिखरा सामान समेटकर जल्दी जल्दी बैग में डालने लगी ,, ट्रैन आने में अभी 5 मिनिट बाकि थे वैदेही को प्यास लगी थी अपना सामान सम्हाले वह पानी के नल की तरफ बढ़ी सामान को रखकर उसने नल चालू किया और हथेली मुंह से लगाए पानी पिने लगी गोरा रंग , काजल से सनी उसकी बड़ी बड़ी आँखे , कमर तक लहराते लम्बे बाल , बालो की लट जो पानी पिते हुए उसके गाल को छू रही थी , चेहरे से छलकता एक आकर्षक नूर जो किसी को भी अपनी तरफ खिंच ले , पानी की टंकी से कुछ ही दूर खड़ा वो शख्स वैदेही को देखे जा रहा था , उसकी नजरे जैसे उसके चेहरे पर जम सी गयी , वह दूर खड़ा अपनी आँखों से ही उसके शरीर का निरिक्षण करने लगा ,,उसने जैसे ही वैदेही की तरफ कदम बढ़ाये उसका फोन बज उठा और वो किसी से बात करने लगा पर बार बार पलटकर वैदेही को देखे जा रहा था उसने अपने साथ खडे दोनो लड़को को वैदेही की तरफ इशारा करके कुछ कहा और फिर फोन पर बात करने लगा पानी पिने के बाद वैदेही ने अपने बैग उठाये और प्लेटफार्म की तरफ बढ़ी ट्रैन आ चुकी थी और उसके चलने की घोषणा भी हो चुकी थी l वैदेही तेजी से अपने कदम बढ़ाते हुए चली जा रही थी l तभी उसे महसूस हुआ की कोई उसका उसका पीछा कर रहा है उसने मुड़कर देखा दो हट्टे कट्टे लड़के उसी की तरफ आ रहे थे वैदेही ने अब और तेजी से अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए वो लगभग भागने लगी और फिर तेजी से ट्रैन में चढ़ गयी लेकिन ये क्या उसने देखा उसके पीछे पीछे वो लड़के भी ट्रेन में चढ़ गए
“ये तू किस मुसीबत में फस गयी वैदेही – उसने मन ही मन कहा और आगे बढ़ती गयी उसका दिल तेजी से धड़क रहा था ट्रेन में बहुत कम लोग थे ऊपर से रात का वक्त था वैदेही मन ही मन खुद को कोस रही थी तभी उसकी नजर सामने से आते लड़के पर पड़ी वैदेही ने कुछ नहीं सोचा और दौड़कर जाकर उसके गले लग गयी और कहने लगी ‘अच्छा हुआ तुम मिल गए, मैं तो डर ही गयी थी कबसे ढूंढ रही हु तुम्हे’ वैदेही के पीछे आये लड़को ने देखा तो वहा से चले गए उनके जाते ही उस लड़के ने वैदेही से कहा – वो लोग जा चुके है …
वैदेही उस से दूर हुई और पीछे मुड़कर देखा वो लोग जा चूके थे भूमि ने अपने सीने पर हाथ रखा और लम्बी साँस लेकर कहा – थैंक गॉड वो लोग चले गए , पता नहीं कौन लोग है तबसे पीछे ही पड़े है , by the way थैंक्यू सो मच तुम नहीं होते तो पता नहीं क्या होता
“इट्स ओके – लड़के ने कहा और आकर अपनी सीट पर बैठ गया
वैदेही भी अपना बैग उठाये अपनी सीट देखने लगी उसकी किस्मत अच्छी थी उस लड़के के सामने वाली सीट पर ही वैदेही की सीट थी , वैदेही ने सामान सीट के निचे रखा और लड़के के सामने बैठ गयी ,, उस बर्थ में सिर्फ वो दो लोग ही थे लड़का किसी नावेल को पढ़ने में व्यस्त था , वैदेही ने कहा – क्या तुम भी पुणे जा रहे हो ?
हम्म्म – लड़के ने कहा और नजरे फिर किताब पर टिका ली …
सफर लंबा था और रात का वक्त था वैदेही को नींद भी नहीं आ रही थी इसलिए उसने सामने बैठे लड़के से बातचीत करने की सोची पर ये क्या वो तो वैदेही पर बिलकुल ध्यान नहीं दे रहा था इतनी खूबसूरत लड़की उसके सामने बैठी थी और वो उस किताब में घुसा हुआ था कोइ और होता तो ये चांस कभी मिस नहीं करता , वैदेही ने एक बार फिर कोशिश की और कहा – मेरा नाम वैदेही है और तुम्हारा ?
“सत्या”- उसने इस बार भी किताब में देखते हुए ही कहा उसे देखकर लग रहा था की इस वक्त उसके लिए उस किताब से इम्पोर्टेन्ट कुछ नही था वैदेही खिड़की के बाहर देखने लगी ट्रेन अपनी रफ़्तार से चल रही थी कुछ ही मिनिट हुए की वैदेही ने फिर कहा – पता नहीं वो लोग मेरे पीछे क्यों पड़े थे ?
“तुम्हारे पास ऐसा कुछ होगा जो उन्हें तुमसे चाहिए और तुम उन्हें देना नहीं चाहती – इस बार उस लड़के ने किताब बंद करके अपनी गोद में रखकर कहा
“पर मेरे पास ऐसा क्या है – वैदेही ने कहा
सत्या ने अपनी किताब उठायी और फिर से नजरे उसपर जमा ली … उसने वैदेही पर कोई ध्यान नहीं दिया वैदेही ने बैग से फोन और इयरफोन निकाला और गाने सुनने लगी अभी कुछ वक्त ही गुजरा होगा की वैदेही जोर जोर से गाने भी लगी सत्या को खीज होने लगी वो खड़ा हुआ और वैदेही के कान से इयर फोन निकालकर कहा – तुम थोड़ी देर के लिए शांत नहीं रह सकती ?
सत्या के चेहरे पर गुस्सा देखकर वैदेही ने फोन वापस अपने बैग में रख लिया ,, सत्या का मूड ऑफ हो चूका था उसने किताब बैग में रखी और खिड़की के बाहर देखने लगा खिड़की से आती हंवा से उसके बाल उड़कर बार बार उसके माथे पर आते और वो उन्हें अपने हाथ से वापस सही कर लेता वैदेही ने देखा ‘गोरा रंग , भूरी छोटी छोटी उदास आँखे , सुर्ख होंठ , बिखरे बाल , गले में एक बारीक़ चैन पहनी हुयी जिसमे ब्लेड जैसा कुछ पहना हुआ था , हाथ में घडी पहनी हुयी थी , शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे जिसकी बाजुओं को उसने मोड़कर ऊपर चढ़ाया हुआ था ,, वह अपनी उदास आँखों से अपलक बाहर देखे जा रहा था , वैदेही की नजर उस पर जम सी गयी वो एकटक उसी को देखती रही जैसे ही सत्या ने उसकी तरफ देखा वो बगले झाँकने लगी और कुछ देर बाद उसने कहा – वैसे पुणे में कहा रहते हो तुम ?
सत्या ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप खिड़की के बाहर देखता रहा वो वैदेही की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहा था पर ना जाने क्यों वैदेही फिर भी उस से बात करना चाह रही थी उसने चुटकी बजाकर उसके सामने हाथ हिलाते हुए कहा – ओह्ह्ह हेलो तुमसे बात कर रही हु , क्या जबसे भाव खाये जा रहे हो , i know तुमने मेरी मदद की पर इतना भी क्या रुड होना मैं कबसे बोले जा रही हु और तुम हो के कोई जवाब ही नहीं दे रहे हो !!

वैदेही की बात सुनकर सत्या ने उसकी तरफ देखा पर गुस्से के भाव देखकर वैदेही डर गयी लेकिन अपने डर को छुपाते हुए कहा – हां हां ठीक है नहीं बात करनी तो मत करो मुझे भी कोई शौक नहीं है … सत्या एक बार फिर खिड़की के बाहर झाँकने लगा वैदेही 24 साल की एक खूबसूरत लड़की थी जो की अपने नाना के साथ मुंबई में रहती थी , उसे चुप बैठना बिलकुल पसंद नहीं था उसे बहुत सारी बाते करना , घूमना , मस्ती करना पसंद था पर आज इस ट्रैन में बैठकर उसे बहुत बोर फील हो रहा था ,, वो को देर शांत बैठी रही और फिर सत्या की तरह एक पैर मोड़कर एक सीट से लगाकर बैठ गयी , हाथ को खिड़की से लगाकर ऊँगली मोड़कर होंठो से लगा ली साफ शब्दों में कहा जाये तो वो सत्या की नकल कर रही थी तभी ट्रैन को झटका लगा और उसका सर खिड़की से जा लगा वो अपना सर मसलने लगी जिसे देखकर सत्या को को हंसी आ गयी उसे हँसता देखकर वैदेही भी मुस्कुराने लगी और कहा – तुम हँसते हुए कितने अच्छे लगते है फिर ये सडु सी शकल बना के क्यों बैठे हो ?
क्योकि मुझे ज्यादा बात करना पसंद नहीं है – सत्या ने कहा
वैदेही आलथी पालथी मारकर सीट पर बैठ गयी और कहने लगी – पर मुझे तो है वैसे मैं मुंबई से हु पर पिछले 3 सालो से पुणे में ही रह रही हु , मेरा एक फाउंडेशन है जिसका नाम मैंने “एंजेल्स” रखा है कुछ लोगो के साथ में वही रहती हु , मुझे घूमना फिरना , नए नए दोस्त बनाना बहुत पसंद है ,, मेरी एक बेस्ट फ्रेंड है माया उसके अलावा दोस्त बहुत है पर अभी तक मुझे किसी से प्यार वयार नहीं हुआ है , मेरे नन्ना मुंबई में ही रहते है साल में एक बार उनसे मिलने जरूर जाती हु , जब 10 साल की थी तभी मेरे मम्मी पापा मुझे छोड़कर इस दुनिया से चले गए उनके जाने के बाद नन्ना ने ही मेरी देखभाल और पढ़ाई करवाई l जाने से पहले पापा मेरे लिए बहुत सारा पैसा छोड़कर गए उन पेसो को किसी अच्छे काम में लगाऊ ये सोचकर ही मैंने पुणे में एंजेल्स फाउंडेशन खोला वहा अभी 20 बच्चे है और अब वही मेरी फैमली है ,,, उनके साथ में बहुत खुश हु
सत्या चुपचाप उसकी बाते सुनता रहा और फिर सीट से अपना सर टीकाकार खिड़की के बाहर देखने लगा वैदेही ने बोलना जारी रखा – वैसे तुम कहा से हो ? नाम थोड़ा अजीब है तुम्हारा ‘सत्या” जैसे कोई डॉन का नाम हो ‘ कहकर वैदेही हंसने लगी और फिर खुद को संयत करके कहा – शादी हो गयी तुम्हारी ? वैसे तुम्हे देखकर लगता तो नहीं है की तुम्हारी शादी हुए होगी , लड़कियों में तुम्हारा कोई खास इंट्रेस्ट नहीं लगता है पर दीखते तो अच्छे ही हो कोई प्यार व्यार का चक्कर है , उसे मिस कर रहे होंगे ना सफर में अरे बताओ बताओ मुझसे क्या शर्माना
सत्या उसकी बातें सुनकर तंग आ चूका था उनसे पीछे से रिवाल्वर निकाली और तेजी से उसकी गर्दन पर लगाकर कहा – अब अगर एक शब्द और कहा तो इस गन की 6 की 6 गोलिया तुम्हारे अंदर उतार दूंगा , वैदेही की घिग्गी बंद गयी वह कुछ बोल ही नहीं पायी सत्या उसके बहुत करीब था वो अपनी बड़ी बड़ी आँखे फाडे सत्या की आँखों में देखे जा रही थी .. सत्या ने गन हटाकर वापस अपने पीछे रख ली और चुपचाप आँखे बंद करके सर सीट से लगा लिया , वैदेही की बातो से वह बहुत अपसेट हो गया और एक बार फिर उसका अतीत उसकी आँखों के सामने घुम गया वो अतीत उसे 13 साल पीछे ले गया !!

13 साल पहले -:
तमिलनाडु का चैन्नई शहर – 13 साल पहले जोे क्राइम के कारण दहशत में था और चैन्नई पर राज करने का सपना रखते थे दो लोग एक रघुवीर और दुसरा था बलराम ,, दोनों ने पुरे शहर में अपनी धाक जमा रखी थी पूरा शहर इन दोनों के नाम से कांपता था जहा ये दोनों अपने धंधे में पार्टनर थे वही दोनों जिगरी दोस्त भी थे ,, और पिछले कई सालो से एक दूसरे के साथ थे एक के पास जिस्म की ताकत थी और दूसरे के पास दिमाग की और इस तरह दोनों ने मिलकर चैन्नई में धंधा शुरू किया किडनैपिंग, हफ्ता वसूली , हथियारों की स्मगलिंग हर वो काम किया वो काम जो लोगो में उनके नाम का डर पैदा करे !! और ऐसा हुआ भी जल्द ही सारे शहर में उन दोनों की हुकूमत थी
रघु और बलराम के अलावा एक शख्स और था जो चैन्नई पर अपना राज चाहता था वो था “विष्णु भाई”
Iविष्णु कोलकता से आया था शुरू शुरू में उसने छोटी मोटी चोरिया और अपराध किये और फिर धीरे धीरे उसने अपने काले धंधो की जड़े उस शहर में जमा ली , विष्णु ड्रग्स की स्मगलिंग करता था और साथ ही लोगो से भारी रकम लेकर मर्डर् और किडनैपिंग करता था उसे सिर्फ पैसे से प्यार था और पैसे के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था विष्णु का एक खास आदमी था “मुन्ना” विष्णु के हर काम में वह उसका साथ देता था , विष्णु के हर काम को अंजाम भी वही देता था पर रघु और बलराम के रहते विष्णु का चैन्नई पर राज करना जैसे एक सपना बनकर ही रह गया उन दोनों को अलग करना इतना आसान नहीं था विष्णु की लगातार कोशिशों के बाद भी वह उन दोनों का कुछ नहीं कर पाया विष्णु अपना सारा काम मुन्ना को सौंपकर कुछ दिनों के लिए कोलकता चला गया ….
रघु और बलराम के पारिवारिक सम्बन्ध भी थे रघु के परिवार में उनकी पत्नी और 9 साल की बेटी थी जिसका नाम मधु था , वही बलराम के परिवार में भी उनकी पत्नी और 12 साल का बेटा था जिसे सब प्यार से बाबू बुलाते थे , बाबू और मधु दोनों एक ही स्कूल में साथ साथ पढ़ते थे और दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे दोनों का घर पास होने के कारण अक्सर दोनों एक साथ खेलते नजर आते थे बाबू का एक दोस्त और था जिसका नाम था मुरली ….

मुरली , मधु और बाबू हमेशा तीनो साथ साथ घूमते और खेलते थे , जितना ज्यादा प्यार था तीनो में झगड़ा भी उतना ही होता था पर बाबू हमेशा मधु का ख्याल रखता था और मधु हमेशा उस से कहती की वह बड़ी होकर उसी से शादी करेगी जबकि उस वक्त दोनों शादी का मतलब भी नहीं जानते थे , रघु और बलराम जब भी बच्चो को साथ हसंते मुस्कुराते देखते तो उन्हें बहुत तसल्ली मिलती थी एक शाम रघु ने अपने जन्मदिन पर बहुत बड़ी पार्टी रखी जिसमे शहर के बडे बड़े लोग शामिल थे विष्णु भी आया था और एक कोने में खड़ा रघु और बलराम को खा जाने वाली निगाहो से देख रहा था ,, मधु और बाबू अपने बाकि दोस्तों के साथ खेलने में लगे थे रघु ने बलराम को अपने पास बुलाया और उसका हाथ अपने हाथो में लेकर कहा – मेरे जन्मदिन के मोके पर तू मेरे लिए कोई तोहफा नहीं लाया ,,
“बोल तुझे की चाहिए तेर लिए मेरी जान भी हाजिर है – बलराम ने कहा
‘जान नहीं मुझे तेरा बेटा बाबू चाहिए – रघु ने मुस्कुराते हुए कहा
बलराम – मैं कुछ समझा नहीं ?
रघु – मैं चाहता हु तेरी मेरी ये दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदल जाये , देख यार जिस धंधे में हम दोनों है उसमे कब किसके साथ क्या हो जाये कोई नहीं जानता पर मैं नहीं चाहता की हमारे बाद हमारी औलाद भी इस डर और दहशत में जिए , मैं अपनी बेटी मधु की शादी तेरे बेटे बाबू से करना चाहता हु …
बलराम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी और उसने रघु को गले लगाते हुए कहा – ये क्या कह दिया आज तुमने तुमने सही कहा की हम दोनों इन बच्चो को कभी इस नर्क में नहीं आने देंगे … रघु ने उसी वक्त सबक सामने अपनी बेटी मधु और बलराम के बेटे बाबू की शादी का ऐलान कर दिया ,, सभी बहुत खुश थे लेकिन विष्णु वहा से पैर पटकता हुआ बाहर निकल गया बाहर मुन्ना उसका इन्तजार कर रहा था उसने विष्णु को देखते ही कहा – भाई आप कहो तो उन दोनों को इसी वक्त उड़ा दू
नहीं मुन्ना , ये सही वक्त नहीं है इस पार्टी में मौजूद लोगो को अगर पता चला तो वो लोग हमे नहीं छोड़ेंगे इन दोनों का काम तमाम का और कैसे करना है सोचना पड़ेगा , अभी यहाँ से चल
दोनों वहा से चले गए …. कुछ दिन बाद बाबू एक तोहफा लेकर मधु के पास आया मधु ने तोहफा खोलकर देखा तो उसमे दूल्हा दुल्हन बने एक गुड्डा और गुड़िया थे मधु उन्हें देखकर बहुत खुश हो गयी और मुस्कुराते हुए बाबू की तरफ देखा
ये तुम हो और ये मैं – बाबू ने उंगली से गुड्डे गुड्डी की तरफ इशारा करके कहा मधु खिलखिलाकर हसने लगी और फिर बाबू की तरफ अपना गाल बढाकर कहा – तो फिर एक पप्पी दो ना ,, बाबू ने धीरे से उसके गाल को छुआ और वहा से चला गया …..
इधर विष्णु गुस्से और हार की आग में जल रहा था उसे रघु और बलराम को अपने रास्ते से हटाना था और फिर एक दिन उसे मौका मिल ही गया और उसने रघु से मिलने की योजना बनाई , विष्णु ने रघु का बड़े प्यार से स्वागत किया और खूब सत्कार किया रघु उसके नापाक इरादो से अन्जान था और फिर विष्णु ने कहना शुरू किया – रघु इस शहर में आये तुझे इतना समय हो गया पर तूने क्या कमाया चंद करोड़ रूपये बस , और मुझे देख सिर्फ 5 सालो में मैं चैन्नई का सबसे रईस इंसान हु सिर्फ अपने धंधे की वजह से , हथियारों की स्मगलिंग में आजकल पैसा कम और रिस्क ज्यादा है वही ड्रग्स की स्मगलिंग में पैसा ही पैसा है मैं ये नहीं कह रहा की बलराम को छोड़ दे , पर तू चाहे तो अपना एक साइड बिजनेस मेरे साथ कर सकता है और अपने सपने पुरे कर सकता है ,,,
न जाने क्यों रघु को विष्णु की बात सही लगी लेकिन फिर उसने मना करते हुए कहा की वह बलराम को धोखा नहीं दे सकता

विष्णु ने अपना प्लान फ़ैल होता देखकर अपनी बातो में मिठास घोलते हुए कहा – अरे ! रघु तू न बहुत भोला है तेरे पास सिर्फ एक बेटी है और वो भी तूने बलराम को देने का फैसला कर लिया है मेरा मतलब उसके घर की बहु बनाने का , उसके बाद तेरे पास क्या बचेगा कुछ भी नहीं और बलराम के बाद उसका बेटा है उसका धंधा सम्हालने के लिए पर तेरे आगे पीछे कोई नहीं और इसकी क्या गारंटी है की वो बलराम का छोकरा तूझे अपने बाप जितनी अहमियत देगा ,, इसलिए कह रहा हु मुझसे हाथ मिला ले उसके बाद तू अकेला पुरे चैन्नई पर राज करेगा और तेरी आगे की जिंदगी ऐश में कटेगी …
विष्णु की बात सुनकर रघु सोच में पड गया उसे सोचते हुए देखकर विष्णु ने शराब का ग्लास उसकी तरफ बढाया और कहा – सोच मत रघु अभी तेरे पास मौका है इस मोके को हाथ से ना जाने दे …
रघु ने विष्णु से हाथ मिला लिया और वहा से चला गया …
अगले दिन से रघु ने विष्णु के गैरकानूनी कामो में उसका साथ देना शुरू कर दिया , अब रघु मर्डर और ड्रग सप्लाई का धंधा भी करने लगा , बलराम से भी कटा कटा सा रहने लगा एक दिन बलराम को रघु के दूसरे धंधो के बारे में पता चला तो वो गुस्से में रघु के ऑफिस पहुंचा बलराम जैसे ही अंदर पहुंचा विष्णु और मुन्ना को वहा देखकर गुस्से से आग बबूला हो उठा बलराम को अचानक वहा देखकर रघु सकपका गया और फिर मुस्कुराते हुए बलराम की तरफ बढ़ा वो कुछ कहता उस से पहले ही बलराम ने रघु के गाल पर जोरदार थप्पड़ रसीद किया और कहा – तू क्या सोचता है तू जो कुछ कर रहा है मुझे पता नहीं चलेगा , अरे पैसे की इस चकाचौंध ने तुझे अंधा बना दिया है रघु तू नहीं जानता की धंधे के नाम पर तू लोगो को मौत बेच रहा है , हमने साथ मिलकर इतने साल धंधा किया लेकिन कभी किसी की जान नहीं ली , और तूने चंद रुपयों के लिए ये सब किया थू है तुझपे ,, इन लोगो की बातो में आकर तूने अपने धंधे के साथ गद्दारी की है रघु और इसके लिए मैं तुझे कभी माफ़ नहीं करूँगा !!
बलराम वहा से चला गया , रघु गुस्से में वही खड़ा रहा उसका गुस्सा देखकर विष्णु ने कहा – देखा तुम्हारी तरक्की बर्दास्त नहीं हुयी उस से तो कैसे बरस पड़ा तुम पर , अरे दोस्त की क्या जरुरत जो तुम्हे ऊचाईया छूते ना देख पाए , देखना अब तुम ही चैन्नई पर राज करोगे .
विष्णु की बातो ने आग में घी का काम किया रघु के दिल में बलराम के लिए नफरत का बीज बोकर विष्णु वहा से चला गया धीरे धीरे रघु और बलराम में दूरिया बढ़ती गयी रघु के दिल में बलराम को लेकर नफरत भर्ती गयी और बलराम को हर वक्त आप दोस्त की चिंता खाये जाती थी वो जानता था की रघु एक ऐसे दलदल में फंस चूका है जिसमे से उसका बाहर निकलना बहुत मुश्किल है !!
महीनो निकल गए लेकिन दोनों में दूरिया इतनी बढ़ चुकी थी की बात करना तो दूर दोनों एक दूसरे को देखते तक नहीं थे , विष्णु अपनी योजना पर बहुत खुश था दोनों में फूट तो वह डाल ही चूका था अब बार थी दोनों को अपने रास्ते से हटाने की अपनी योजना के मुताबिक उसने पुलिस को रघु के अड्डों की जानकारी दी और नाम बलराम का लगा दिया , रघु का धंधा ख़त्म होने लगा एक शाम जब वह विष्णु के साथ बैठा तो कहने लगा – उस बलराम को मैंने हमेशा अपना भाई माना लेकिन उसने क्या किया उसने मेरे ही धंधे को ख़त्म कर दिया ,, आखिर वो मुझसे चाहता क्या है क्या करू मैं उसका
‘अपने रास्ते से हटा दो – विष्णु ने शराब का आखरी बचा घूंट पीते हुए कहा
“ये तू क्या कह रहा है वो मेरा दोस्त है – रघु का नशा उतर चुका था
‘इस धंधे में कोई किसी का दोस्त या भाई नहीं होता , इतने दिनों में उसने एक बार भी तुझसे मिलने या बात करने की कोशिश नहीं की , देख रघु अगर तुझे इस धंधे में आगे बढ़ना है तो बलराम को रास्ते से हटाना होगा – विष्णु ने उसकी तरफ शराब का ग्लास बढ़ाते हुए कहां
एक बार फिर विष्णु की बाते रघु के दिमाग पर हावी हो गयी और उसने कहा – उस ख़त्म करना इतना आसान नहीं है
विष्णु – वो सब तू मुझपर छोड़ दे , उसे कब कैसे ख़त्म करना है मैं बताऊंगा …
और फिर बैठकर दोनों शराब पिने लगे !!

दो दिन बाद विष्णु के कहने पर रघु ने बलराम को फोन किया और फोन पर रोने का नाटक करते हुए बलराम से कहने लगा – बलराम मेरे दोस्त मेरे भाई मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई , तू सही कहता था मेरे भाई मैं पैसे की रौशनी में अँधा हो गया था पर अब मेरी आँख खुल चुकी है मैं अपने किये पर बहुत शर्मिंदा हु मेरे दोस्त हो सके तो मुझे माफ़ कर देना
रघु की बात सुनकर बलराम का दिल पिघल गया उसने रघु को उसी वक्त घर के पास वाले मंदिर आने को कहा , रघु ने फोन रखा और एक तिरछी मुस्कान से विष्णु की तरफ देखने लगा , बलराम अपनी पत्नी और बेटे के साथ मंदिर आया था वही उसे रघु की पत्नी और बेटी मिल गयी वे दोनों भी मंदिर दर्शन के लिए आयी हुयी थी बलराम ने उन्हें रघु के आने की बाद बताई वे सभी वहा खड़े होकर उसक इन्तजार करने लगे थोड़ी देर बाद वह दो बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी आगे वाली गाड़ी से रघु उतरा और बलराम की तरफ बढ़ा इतने दिनों बाद दो दोस्त वापस मिल रहे थे इसकी ख़ुशी उनके चेहरों पर साफ झलक रही थी , रघु ने आते ही बलराम को गले लगा लिया बलराम की आँखों से आंसू निकलने लगे तभी बलराम की एक दर्दभरी आंह निकली उसे अपने पेट के दायी तरफ भयंकर दर्द महसूस हुआ उसने बड़ी मुश्किल से देखा उसके पेट में खंजर अंदर तक घुसाया हुआ था जिस हाथ में वो खंजर था वो हाथ उसी के दोस्त रघु का था वो कुछ कहता इस से पहले ही खंजर एक बार फिर उसके पेट के आर पार हो गया ! बलराम निचे गई पड़ा उसकी पत्नी चिल्ला उठी तभी गोली की आवाज माहौल में गूंज उठी और बलराम की पत्नी गिर पड़ी गोली विष्णु ने चलायी थी ,, रघु ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर उस गाड़ी में बैठाया , बाबू दौड़कर बलराम के पास आया खून देखकर वह घबरा गया उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या करे ,, रघु ने किसी को फ़ोन लगाया और तुरंत वहा आने को कहा बलराम की सांसे अभी भी चल रही थी लेकिन वह अकेला बच्चा क्या करता बलराम बेटे का हाथ पकड़कर बड़ी मुश्किल से कहने लगा – मुझे माफ़ कर देना बेटा मैं तुम्हारी माँ को बचा नहीं पाया , रघु इतना बुरा इंसान नहीं है उसने जो कुछ भी किया उस विष्णु के बहकावे में आकर किया है बेटा मुझे मेरे कर्मो की सजा मिल चुकी है लेकिन तू कभी इस रास्ते मत चलना बेटा’ बलराम की सांसे उखड़ने लगी और देखते ही देखते वह दुनिया से चला गया ,, बाबू उसका हाथ थामे रोता रहा ,, उसे अपनी पिता की कही कोई बात याद नहीं थी उसके दिमाग में बस एक नाम घूम रहा था और वो था “विष्णु”

to be continue -:

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Sanjana Kirodiwal

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