Pasandida Aurat Season 2 – 70
Pasandida Aurat Season 2 – 70

पृथ्वी और अपने ही पापा से थप्पड़ खाकर प्राची अपने केबिन में चली आयी। पृथ्वी ने उसे थप्पड़ मारा इस बात से वह बहुत गुस्से में थी और जब वह अंदर के गुस्से को सम्हाल नहीं पायी तो उसने केबिन में आकर टेबल पर पड़े सारे सामान को नीचे फेंक दिया। गुस्सा उसके चेहरे से साफ झलक रहा था और आँखों में आँसू भर आये। उसने टेबल पर अपने दोनों हाथ टिकाये और आँसुओ से भरी आँखों से टेबल को घूरने लगी।
सामान गिरने की आवाज सुनकर भरत प्राची के केबिन में आया और जब उसने फर्श पर फैला सामान देखा तो उसे समझते देर नहीं लगी कि ये सब प्राची ने किया है। प्राची ने अपने महंगे लेपटॉप के साथ साथ और भी कई महंगे सामान का नुकसान कर दिया था। भरत प्राची के पास आया और कहा,”मैडम आप ठीक है ना ?”
“मुझे किसी से बात नहीं करनी , चले जाओ यहाँ से”,प्राची ने पलटकर गुस्से से तेज आवाज में कहा
प्राची को गुस्से में देखकर भरत पीछे हटा और अपना सर झुकाकर वहा से चला गया।
प्राची गुस्से की आग में अभी भी जल रही थी कि उसकी नजर नीचे फर्श पर गिरी अपनी और मिस्टर देसाई की तस्वीर पर पड़ी जिसका फ्रेम और शीशा टूट चुका था। प्राची भीगी आँखों से एकटक उस टूटी हुई फ्रेम को देखती रही जिसमे तस्वीर थी। ये तस्वीर प्राची हमेशा अपनी टेबल के कॉर्नर पर रखती थी अपनी आँखों के सामने क्योकि वह बिजनेस में बिल्कुल अपने पापा जैसी बनना चाहती थी। प्राची उस टूटी हुई फ्रेम की तरफ आयी और जैसे ही उसे उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया
उसे सहसा ही देसाई सर के मारे गए थप्पड़ की याद आ गयी और प्राची ने उसी ख्याल में फ्रेम की तरफ हाथ बढ़ाया और कांच के एक टूटे हुए हिस्से ने प्राची के हाथ को जख्मी कर दिया। यह आह प्राची के मुँह से निकली और वह अपने ख्याल से बाहर आयी तो उसने देखा उसके हाथ में कट लगा है और वहा से खून बह रहा है। प्राची ने खून पर ध्यान नहीं दिया और उस तस्वीर को उठाकर सोफे की तरफ चली आयी। हाथ मे लगी चोट से रिसते खून की बुँदे टपटप करके फर्श पर गिर रही थी।
प्राची सोफे पर आ बैठी और उस तस्वीर को देखते हुए कहा,”आज पृथ्वी की वजह से आपने मुझ पर हाथ उठाया डेड , मुझ पर अपनी इकलौती बेटी पर ,, हाह ! आप ऐसा कैसे कर सकते है डेड ? आपके लिए आपकी बेटी की ख़ुशी से बढ़कर बिजनेस है। मैं पृथ्वी को चाहती हूँ ,बहुत चाहती हूँ और यही सच है ये जानने के बाद भी आपने उस पृथ्वी का साथ दिया , एक बार भी नहीं सोचा मुझे कितना बुरा लगेगा ? डेड आपके बाद पहली बार इस जिंदगी में मुझे कोई ऐसा मिला जिसके साथ मैं अपनी पूरी जिंदगी ख़ुशी ख़ुशी बिता सकती हूँ फिर भी वो मेरा नहीं हो सकता,,,,,,,,,क्योकि वो उस अवनि से प्यार करता है”
ये कहने के साथ ही प्राची के चेहरे पर एक बार फिर गुस्से और नफरत के भाव उभर आये और उसने हाथ में पकड़ी फ्रेम को फेंक दिया। फ्रेम अब पूरी तरह से टूटकर बिखर चुकी थी और प्राची ने अपना सर पीछे सोफे के हत्थे से लगाकर आँखे बंद कर ली। उसके नीचे लटकते हाथ से खून बूँद बूँद करके टपक रहा था और फर्श पर इकट्ठा हो रहा था।
देसाई सर के ऑफिस से बाहर निकला पृथ्वी बहुत गुस्से मे था। ऐसा नहीं था कि उसे गुस्सा नहीं आता था लेकिन आज उसे गुस्से के साथ साथ खुद पर खीज भी हो रही थी कि वह अवनि को प्राची के सामने लाया ही क्यों ? पृथ्वी ने आसमान की तरफ देखकर अपना सर उठाया और कमर पर दोनों हाथ रखकर दो चार गहरी सांसे ली। उसका गुस्सा अभी भी था उसने अपना सर झुकाया और खुद में ही धीरे धीरे बड़बड़ाने लगा,”मेरी वजह से उस प्राची ने अवनि के साथ बदतमीजी की।
मैंने अवनि से शादी की है , मैंने उस से जिंदगीभर उसका ख्याल रखने का वादा किया है इसके बाद भी वो प्राची , वो खामखा अवनि से नफरत करती है उसकी दुश्मन बन गयी है और अब उसे नुकसान पहुंचाना चाहती है। मुझे ,मुझे अवनि को प्रोटेक्ट करना होगा ,उसे प्राची से और ये सब चीजों से दूर रखना होगा”
पृथ्वी ने एक बार फिर गहरी साँस ली और फिर वहा से चला गया।
देसाई ग्रुप एंड कम्पनी , वाशी
प्राची के केबिन से निकलकर भरत बाहर आया और रिसेप्शन पर नीलेश के बारे में पूछा
“नीलेश सर तो प्राची मेडम के साथ ही बाहर गए थे मीटिंग के लिए लेकिन वापस प्राची मेडम अकेले आयी थी नीलेश सर नहीं आये”,रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने कहा तो भरत परेशान हो गया। उन्हें परेशान देखकर लड़की ने कहा,”शायद नीलेश सर केंटीन में होंगे आप एक बार वहा पूछ लीजिये”
“हम्म्म थैंक्यू !”,भरत ने कहा और वहा से चला गया
भरत केंटीन में आया लेकिन नीलेश वहा नहीं था , इसके बाद भरत ने पूरा ऑफिस छान मारा लेकिन नीलेश उन्हें कही नहीं मिला। नीलेश को ढूंढते हुए भरत ऑफिस लॉबी में आया और जेब से अपना फोन निकालकर कहा,”आखिर ये नीलेश कहा चला गया ? मैंने उस से कहा था प्राची के साथ रहना और मुझे हर पल की खबर देना लेकिन इस लड़के का तो कुछ भी पता नहीं है,,,,,,,,,,,!!!”
कहते हुए भरत ने फोन कान से लगा लिया। रिंग जा रही थी लेकिन नीलेश ने फ़ोन नहीं उठाया और भरत ग़ुस्से में बड़बड़ाया,”अब ये मेरा फोन क्यों नहीं उठा रहा ? कही प्राची और नीलेश के बीच कोई झगड़ा तो नहीं हुआ है ? नीलेश ऑफिस में नहीं है और वहा वो प्राची भी काफी गुस्से में है , कही इस गधे नीलेश ने मेरा प्लान तो फ़ैल नहीं कर दिया,,,,,,,,,,!!!”
“भरत सर ! देसाई सर ने आपको बुलाया है”,ऑफिस बॉय ने आकर कहा
“हाँ मैं आता हूँ”,कहकर भरत ने ऑफिस बॉय को वहा से भेजा और खुद एक बार फिर नीलेश का नंबर डॉयल कर कान से लगाते हुए बड़बड़ाये,”फोन उठाओ नीलेश,,,,,,,,,,!!!!”
इस बार भी नीलेश ने फोन नहीं उठाया तो भरत ने निराश होकर फोन जेब में रखा और वहा से चला गया।
सिरोही , राजस्थान
सुरभि के फोन करने पर सिद्धार्थ उसे लेने बस स्टेण्ड चला आया लेकिन सुरभि के सिरोही आते ही उसकी मनमानियां शुरू हो चुकी थी जिस से सिद्धार्थ को खीज तो बहुत हुई लेकिन इस वक्त उसे सुरभि की जरूरत थी इसलिए वह चुपचाप उसे झेल रहा था। सिद्धार्थ गाडी चलाकर अभी कुछ ही दूर आया होगा की सुरभि ने एकदम से कहा,”गाडी रोको , गाड़ी रोको ,गाड़ी रोको,,,,,,,,,,,,,!!”
सुरभि के अचानक चिल्लाने से बेचारा सिद्धार्थ घबरा गया और एकदम से ब्रेक मारा तो सुरभि का सर डेशबोर्ड से जा टकराया। सुरभि ने गुस्से से सिद्धार्थ को देखा और उसकी बाँह पर जोर से मुक्का मारकर कहा,”स्टुपिड ! ऐसे कौन गाडी रोकता है ?”
“तुम्हारा हाथ है या पत्थर ! खाने में क्या सीमेंट खाती हो तुम ?”,सिद्धार्थ ने चिढ़कर अपनी बाँह सहलाते हुए कहा
“हाहाहाहाहा बहुत अच्छा जोक था अब जाओ जाकर मेरे लिए छोले भटूरे लेकर आओ”,सुरभि ने अपने हाथो को बांधकर सिद्धार्थ को आर्डर देते हुए कहा
“तुम्हारा दिमाग तो सही है मैं तुम्हारे लिए छोले भठूरे लेने जाऊंगा ? हरगिज नहीं ! चुपचाप घर चलो ,पापा से मिलो उन्हें सच बताओ और उसके बाद तुम्हे जहा जाना है तुम जा सकती हो जो खाना है खा सकती हो”,सिद्धार्थ ने चिढ़कर गुस्से भरे स्वर में कहा “वाह वाह वाह क्या बात है ? भूलो मत मैं वहा तुम्हे बचाने ही जा रही हूँ और अगर इतनी ही तकलीफ है तो मैं यही उतर जाती हूँ। तुम बैठे रहो अपना ये ऐटिटूड लेकर,,,,,,,,,,,,!!!”
सुरभि ने कहा और उतरने के लिए जैसे ही दरवाजा खोलने लगी सिद्धार्थ सुरभि की तरफ झुका और दरवाजा वापस बंद करते हुए कहा,”तुम क्या पागल वागल हो , एटलीस्ट मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त तो दो”
“ठीक है ! सोच लो तुम्हारे पास दो मिनिट है”,सुरभि ने एक बार फिर अपने हाथो को बांधकर सामने देखते हुए कहा
सिद्धार्थ कुछ देर सुरभि को देखता रहा और फिर अपना सर स्टेयरिंग पर पटककर कहा,”अह्ह्ह्हह ! क्या मुसीबत है ? बैठो लेकर आता हूँ”
सुरभि ने सुना तो सिद्धार्थ की तरफ देखा और मुस्कुरा कर कहा,”जल्दी और साथ में एक गिलास छाछ भी”
सिद्धार्थ ने सुना तो मन ही मन झल्ला उठा ,उसका दिल किया उसी छाछ में थोड़ा सा जहर भी मिला दे ताकि हमेशा हमेशा के लिए इस मुसीबत से उसका पीछा छूटे लेकिन बेचारा ऐसा नहीं कर सकता था। उसने गाड़ी साइड में लगाई और उतरकर सुरभि के लिए छोले भठूरे लेने चला गया।
सिद्धार्थ छोले भठूरे लेकर आया तब तक सुरभि मजे से अपना फोन चलाती रही। थोड़ी देर बाद सिद्धार्थ एक हाथ में छोले भटूरे की प्लेट और दूसरे हाथ में छाछ का गिलास लेकर गाड़ी के पास आया और सुरभि की तरफ आकर उसे शीशा नीचे करने का इशारा किया। सुरभि ने जल्दी से शीशा नीचे किया और सिद्धार्थ के हाथ से छोले भठूरे की प्लेट लेकर गोद में रख ली। उसने छाछ का गिलास लिया तो सिद्धार्थ ने उसे ताना मारकर कहा,”और कुछ मैडम ?”
सुरभि जिसे खाने के सामने ताने वाने कम ही समझ आते थे उसने भठूरे का एक टुकड़ा तोड़कर मुँह में रखते हुए कहा,”हाँ एक बॉटल ठंडा पानी और इसके बाद खाने के लिए कुछ मीठा”
कहकर सुरभि ने अपना ध्यान फिर खाने में लगा लिया। सिद्धार्थ ने सुना तो पैर पटकते हुए दूसरी तरफ आया , पानी का बॉटल खरीदा और ड्राइवर सीट का दरवाजा खोलकर अंदर आ बैठा। उसने पानी का बोतल गाड़ी के डेशबोर्ड पर रख दिया और सुरभि का इन्तजार करने लगा ताकि वह खाना खत्म करे और सिद्धार्थ आगे बढे।
सुरभि के एक हाथ में छाछ का गिलास था और एक हाथ से वह ठीक से खा नहीं पा रही थी क्योकि भटूरा गर्म था। उसने इधर उधर देखा और फिर छाछ का गिलास सिद्धार्थ को थमाकर खुद दोनों हाथो से तोड़तोडक़र भटूरा खाने लगी। बीच बीच में वह सिद्धार्थ के हाथ से गिलास लेती एक घूंठ भरती और गिलास वापस उसे थमा देती।
सुरभि को इतना दिल से खाते देखकर सिद्धार्थ अपना गुस्सा भूल गया और ख़ामोशी से उसे देखने लगा।
सुरभि ने तीन चार निवाले खाये वह छाछ पीना ही भूल गयी और इस बार तो उसने अपने हाथ पहले से भी ज्यादा गंदे कर लिए थे तो सिद्धार्थ ने खुद अपने हाथ से गिलास उसके मुँह की तरफ बढ़ा दिया। सुरभि ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया और एक घूंठ पीकर बचा हुआ खाना खत्म करने लगी। सिद्धार्थ ने देखा सुरभि खा चुकी है तो उसने सुरभि के कहने से पहले ही उसकी गोद में रखी प्लेट और खाली गिलास उठाया और गाड़ी से उतरकर डस्टबिन में डालने चला गया।
सुरभि ने सामने रखे पानी के बोतल को उठाया और खिड़की से बाहर हाथ धोकर पानी पीने लगी। सिद्धार्थ वापस आया और देखा सुरभि अब शांत है तो उसने गाड़ी स्टार्ट की और कहा,”सीट बेल्ट लगाओ”
“हां ! क्या ?”,सुरभि को समझ नहीं आया क्योकि उसका ध्यान कही ओर था।
सिद्धार्थ उसकी तरफ झुका और सीट बेल्ट खींचकर लगाने लगा तो सुरभि ने कहा,”सीट बेल्ट लगाने के बहाने कही तुम मेरा फायदा तो नहीं उठाना चाहते ?”
सिद्धार्थ ने सुना तो पीछे हटा और अपनी सीट पर बैठते हुए कहा,”दिमाग खराब नहीं है मेरा ,बिना कुछ किये इतना सब झेलना पड़ रहा है , कुछ कर लिया तो पता नहीं क्या क्या झेलना पडेगा ?”
सुरभि ने सुना तो मुँह बनाया और सीट पर पसरकर अपना सर सीट से लगाकर बाहर देखने लगी। सिद्धार्थ ने भी गाड़ी की स्पीड बढ़ाई और घर की तरफ निकल गया
हिमांशु का घर , मुंबई
हिमांशु अवनि को लेकर अपने घर पहुंचा। रवि जी , लता और लक्षित को छोड़कर बाकि सब हिमांशु के घर में ही मौजूद थे। गाडी के आने की आवाज सुनकर साक्षी ने खुश होकर कहा,”लगता है वो लोग आ गए,,,,,,,,!!!”
“हाँ तो इसमें इतना खुश होने वाली कौनसी बात है ? वो एक मामूली सी लड़की है कही की महारानी नहीं जो तुम सब जाकर उसके स्वागत में खड़ी हो जाओ”,नीलाम भुआ ने रूखे स्वर में कहा।
साक्षी ने सुना तो उसे अच्छा नहीं लगा लेकिन बड़ो के बीच बोलना उसे सही नहीं लगा इसलिए उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप एक तरफ खड़ी रही।
“इसे यहाँ बुलाने की क्या जरुरत थी ? रवि और लता को पता चला तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा”,बड़े पापा ने कहा
“दादा ! उन्हें मैंने पहले ही बता दिया था कि वो होली पर दो दिन यहाँ आने वाली है , हम सबने उसे पृथ्वी की बायको स्वीकार नहीं किया लेकिन रस्म तो रस्म होती है न और फिर वो लड़की परायी है लेकिन पृथ्वी तो अपना है न,,,,,,,,,,,,दो दिन की बात है और दो दिन में हम सब भी देख लेंगे कितना प्यार है उसे हमारे पृथ्वी से और उसके लिए क्या कर सकती है वो ?”,नीलम भुआ ने कहा
“बात तो नीलम सही कह रही है दादा ! अवनि दो दिन यहाँ रहेंगी तो बाकि सब से घुल मिल भी जाएगी और हम सब भी देख लेंगे वह इस परिवार में निभा पायेगी या नहीं”,इस बार चाचा ने कहा
“ठीक है अब सबने फैसला कर ही लिया है तो फिर यही सही”,बड़े पापा ने कहा और उठकर अंदर चले गए
घर की डोरबेल बजी , नीलम भुआ ने चाची से दरवाजा खोलने का इशारा किया तो चाची ने जाकर दरवाजा खोला।
सामने अवनि का बैग और अपना ऑफिस बैग उठाये हिमांशु खड़ा था और उसके बगल में दो कदम पीछे अवनि खड़ी थी। चाची ने दोनों को देखा और अंदर आने को कहा। हिमांशु अंदर चला गया और अवनि दरवाजे पर ही रुक गयी। पृथ्वी के बिना अंदर जाना उसे थोड़ा अजीब लग रहा था। शादी के बाद पहली बार वह अपने ससुराल में किसी के घर आयी थी और पृथ्वी उसके साथ नहीं था। चाची ने देखा अवनि बाहर ही खड़ी है और किसी सोच में डूबी है तो उन्होंने कहा,”क्या हुआ ? अंदर आओ”
“अरे वहिनी ! अंदर कैसे आएगी ,ना आरती की थाली ना इसके स्वागत में चावल का कलश,,,,,,,,,ये सोच रही होंगी ससुराल में इसका स्वागत ऐसे होगा”,नीलम भुआ ने चाची और अवनि की तरफ आते हुए कहा। अवनि ने सुना तो नजरे उठाकर चाची और नीलम भुआ को देखा और धीरे से कहा,”नहीं भुआजी ! मैंने ऐसा कुछ नहीं सोचा मैं तो बस,,,,,,,,,,,,,,!!!!”
“बहू का स्वागत घर में पति के साथ होता है , अब तुम तो अकेली मुँह उठाकर चली आयी तो कैसा स्वागत ? आओ अंदर आओ सब कब से बैठे है,,,,,,,,,,!!!”,नीलम भुआ ने कहा और मुँह बनाकर अंदर चली गयी।
अवनि ने सुना तो उसके दिल में एक टीस उठी और आँखे लगभग भर आयी। इतना तो उसे समझ आ चुका था कि पृथ्वी के बिना उसे इस घर में मान-सम्मान नहीं मिलेगा लेकिन फिर भी सबकी ख़ुशी के लिए अवनि ने अपना दिल मजबूत किया और अंदर चली आयी।
( प्राची का ये पागलपन क्या लाएगा पृथ्वी और अवनि की जिंदगी में तूफ़ान और कर देगा तबाह उनकी हसंती खेलती जिंदगी ? सुरभि के इतना पास होकर भी आखिर क्यों नहीं उठाना चाहता सिद्धार्थ उसका फायदा ? पृथ्वी के घरवालों के साथ क्या अवनि निभा पायेगी या हो जाएगी परेशान ? जानने के लिए पढ़ते रहिये “पसंदीदा औरत” मेरे साथ )
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संजना किरोड़ीवाल


Neelam bua Avni ko preshan krne wali hai aur baki sab na chahate huye bhi bua ka sath denge, quki bua ne Avni k khilaf plan hee esa banaya hai…khar 2 din Avni ko kaise bhi krke katne honge…aur bahat sabar se kaam lena hoga…tabhi uski entry hogi Prithvi k ghar m…lakin inn 2 dino m to Prithvi Avni k bina behal ho jayega… Prachi zarur Avni se badla legi.