Pasandida Aurat – 91
Pasandida Aurat – 91

अवनि ने जैसे ही महादेव को जल अर्पित करने के लिए हाथ उठाये उसके कानो में किसी की आवाज पड़ी। एक पल के लिए अवनि को भी लगा जैसे पृथ्वी यहाँ है उसने धड़कते दिल के साथ पलटकर देखा तो उसकी हमउम्र लड़की किसी को आवाज दे रही थी , अवनि ने देखा एक छोटा लड़का उसके बगल से निकलकर शिवलिंग की तरफ जा रहा है , उसके हाथ में छोटा कलश था और सबकी देखा देखी में वह भी जल अर्पित करना चाहता था।
“पृथ्वी ! यहाँ आओ , तुम्हारा हाथ नहीं जाएगा बेटा”,लड़की ने बच्चे की तरफ आते हुए कहा
अपनी माँ से बचने के लिए बच्चा अवनि के पास चला आया। अवनि ने देखा तो उसे अपने आगे किया और अपना कलश उसके साथ थामकर कहा,”चलो पृथ्वी ! हम दोनों साथ साथ जल अर्पित करते है”
अवनि का अपनापन देखकर लड़की मुस्कुरा दी और साइड में खड़ी होकर दोनों को देखने लगी। दोनों ने जल अर्पित किया और फिर बच्चा अपनी माँ की तरफ चला गया तो उसने अवनि से कहा,”थैंक्यू , बच्चा है न तो जिद करने लगा , मैं प्रेग्नेंट हूँ तो झुक नहीं सकती,,,,,,,!!!”
“कोई बात नहीं ! अभी से इसके मन में ईश्वर को लेकर इतना प्रेम है देखकर अच्छा लगा”,अवनि ने कहा तो बच्चे और उसकी मम्मी ने हाथ हिलाकर उसे बाय कहा और दोनों वहा से चले गए। अवनि ने पलटकर शिवलिंग को देखा और अपना ललाट उस पर रख दिया। उसके पल उसके मन को जो सुकून मिला उसे शब्दों में बया नहीं किया जा सकता। अवनि वही बैठकर उस चौकड़ी को साफ करने लगी और मन में जो चल रहा था सब महादेव को कह सुनाया।
सिद्धार्थ से दूर जाकर जहा अवनि को तकलीफ हुई थी वही पृथ्वी से दूर होकर भी उसका मन शांत था। अवनि ने सिद्धार्थ के साथ कितने ही शिव मंदिर में जल अर्पित किया होगा , उसे पाने की दुआ मांगी होगी लेकिन पृथ्वी के साथ कभी ना जल अर्पित किया ना उसके साथ की दुआ मांगी , फिर भी पृथ्वी उसके साथ था और आज पृथ्वी उसके साथ ना होकर भी किसी और रूप में साथ था वरना ऐसे ही तो किसी का नाम पृथ्वी नहीं होता,,,,,,,,,!!
अवनि कुछ देर मंदिर में रुकी और फिर घर के लिए निकल गयी , रास्ते से उसने सुरभि के लिए उसकी पसंद की पेस्ट्री ली और घर आ गयी। दिनभर दोनों घर में ही थी। सुरभि अवनि के लेपटॉप पर कोई सीरीज देखती रही और अवनि ने पुरे घर की अच्छे से सफाई की। शाम में उसी ने खाना बनाया और दोनों ने बाते करते हुए खाया। बाकि दिनों के बजाय आज अवनि के चेहरे पर उदासी नहीं थी।
सुरभि को तसल्ली मिली की धीरे धीरे ही सही अवनि सम्हल रही है और पहले की तरह जिंदगी जीने की कोशिश कर रही है। सुरभि ने पृथ्वी को लेकर अवनि से बात करना भले ही कम कर दिया पर वह अभी चाहती थी कि पृथ्वी और अवनि एक हो जाये।
पनवेल , मुंबई
ऑफिस के बाद पृथ्वी घर के लिए निकल गया , आज वह ट्रेन से ना जाकर टेक्सी में आ बैठा। रास्तेभर पृथ्वी खामोश रहा और अवनि के बारे में सोचता रहा। टेक्सी उसी शिव मंदिर के सामने आकर रुकी जहा से पृथ्वी लता के साथ तो कई बार खुद भी निकला था लेकिन कभी अंदर नहीं गया।
पृथ्वी ने टेक्सी का दरवाजा खोला और बाहर आकर टेक्सी वाले को पैसे दिए और मंदिर की सीढ़ियों के सामने आकर खड़ा हो गया। उसका दिल धड़क रहा था और आँखों में उदासी थी। आज पृथ्वी खुद चलकर मंदिर आया था , वो पृथ्वी जो मंदिर आने से चिढ़ता था , ईश्वर से शिकायते करता था , उनसे कुछ मांगने को अपना अपमान समझता था , जिसने अवनि के सामने उसके महादेव को नकार दिया , आज वही पृथ्वी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। उसने अपने कदम आगे बढ़ाये और सीढिया चढ़कर मंदिर में चला आया।
इस वक्त इस मंदिर में भीड़ ना के बराबर होती थी , मंदिर में पंडित जी और इक्का दुक्का लोग ही थे। पृथ्वी अंदर आया मंदिर में लगी घण्टी को हाथ की उंगलियों से छुआ और एक मधुर आवाज उसके कानो में पड़ी ! सामने महादेव की बड़ी सी प्रतिमा थी। पृथ्वी धीमे कदमो से चलकर उनके सामने आया। वह एकटक उन्हें देखता रहा और कुछ पल बाद ही उसे लगा जैसे महादेव के होंठ उसे देखकर मुस्कुरा रहे है , पृथ्वी को लगा जैसे वे उसे देखकर नहीं बल्कि उसके हालात पर हंस रहे हो और ये कह रहे हो कि “क्यों आखिर आना ही पड़ा ना मेरे पास”
पृथ्वी ने अपने हाथ जोड़े और मन ही मन कहने लगा,”जानता हूँ आज मुझे यहाँ देखकर आपको हैरानी हो रही होगी , पर अगर मुझ जैसा इंसान यहाँ खड़ा है तो इसका मतलब ये है कि इस वक्त वो कितना बेबस और मजबूर होगा। वो कहती है कि किस्मत में लिखा होगा तो हम मिल जायेंगे , महादेव ने अगर हमे मिलाया है उन्होंने ने भी हमारे बारे में कुछ सोचा ही होगा,,,,,,,,,,,,,,मैं नहीं जानता आपने क्या सोचा है मैं बस इतना जानता हूँ कि मैं उसके बिना नहीं रह सकता , मैं उसे अपनी जिंदगी के हर पल में देखता हूँ ,,
आज तक मैंने आपसे कुछ नहीं मांगा है हमेशा अपनी मेहनत और कर्म पर विश्वास करके वो सब हासिल किया है जो मुझे चाहिए था लेकिन मैं जान गया हूँ कि अवनि मुझे सिर्फ मेहनत से नहीं मिलेगी उसके लिए किस्मत भी जरुरी है और वो सिर्फ आप बदल सकते है,,,,,,उसे मेरी किस्मत में लिख दीजिये महादेव,,,,,,,,,मैं जिंदगीभर आपका ये अहसान याद रखूंगा ,, वो आपको बहुत मानती है पर इस बार आप उसकी मत सुनना क्योकि मैं ये भी जानता हूँ कि वो आपसे यही मांगेगी कि मैं उसे भूलकर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाऊ,,,,,,,,,
लेकिन मैं उसके बिना आगे नहीं बढ़ना चाहता महादेव , अगर हमारा मिलना नसीब में नहीं लिखा तो फिर हमे मिलते ही क्यों ? उसे लगता है मैं पहली बार उस से सिरोही में मिला पर आप तो जानते है हम पहले ही मिल चुके थे आपकी काशी में और कहते है कि “काशी में टकराने वाले दो लोग ऐसे ही नहीं टकराते” ,, हजारो की भीड़ में उस शाम गंगा आरती के उस पार मुझे उसका ही चेहरा क्यों नजर आया ? आपके मंदिर में सैंकड़ो लोग खड़े थे फिर उसने मेरी ही हथेली पर फूल क्यों रखा ? उसके पैर की वो एक पायल मुझे ही क्यों मिली ?
मैं इन सब में विश्वास नहीं करता लेकिन वो करती है और उसका विश्वास मेरे लिए हर विश्वास से ऊपर है,,,,,,,,,,,हाह ! मैं नहीं जानता मैं आपसे क्या कहु ? कैसे आपको समझाऊ कि उसके बिना मैं कैसा महसूस करता हूँ ? मैं सब आप पर छोड़ता हूँ महादेव अवनि को मेरी किस्मत में लिख दीजिये या फिर ये जिंदगी मुझसे छीन लीजिये क्योकि उसके बिना जीने की कल्पना मैं नहीं कर पाऊंगा,,,,,,,,,,!!!”
पृथ्वी की आँखों में भरे आँसू गालों पर बह गए , गला रुँध गया और धड़कने बहुत ही धीमी चलने लगी। पृथ्वी अपने अंदर एक ऐसा दर्द महसूस कर रहा था जो वह किसी को बोलकर नहीं बता सकता था। वह अवनि से इस कदर प्यार करने लगा था कि उसे अब अवनि के अलावा और कुछ नहीं चाहिए था और इसके लिए आज वह महादेव के सामने भी चला आया। पृथ्वी ने अपने कदम पीछे लिए और मंदिर से बाहर चला आया। वह सीढ़ियों पर आ बैठा , अब अंदर भरी तकलीफ को जैसे तैसे करके बाहर तो निकालना ही था इसलिए पृथ्वी रो पड़ा , वह अकेला था उसे वहा देखने वाला कोई नहीं था।
एक दो लोग उसके सामने से गुजरे भी लेकिन ना उन्होंने पृथ्वी पर ध्यान दिया ना ही पृथ्वी को उन से कोई फर्क पड़ा। वह बस रो रहा था और रोकर ही सही पर अपने मन को हल्का करना चाहता था। आज उसका जन्मदिन था , ख़ुशी का दिन था और आज ही के दिन पृथ्वी सबसे ज्यादा दुखी था। उसने अपने आँसू पोछे और उठकर पैदल ही घर के लिए चल पड़ा। उतरा हुआ चेहरा , खामोश लब और उदास आँखे लिए पृथ्वी फुटपाथ पर चला जा रहा था। चलते चलते पृथ्वी की नजर फुटपाथ के पास बैठे कुछ लड़को पर गयी जो गिटार लिए कुछ गा रहे थे
पृथ्वी आगे बढ़ गया लेकिन लड़को ने जो गाया वो उसके कानों में अब भी गूँज रहा था जो कि उसके हालातो से मिलता जुलता ही था।
पृथ्वी घर पहुंचा तो देखा घर के हॉल में टेबल पर पृथ्वी के लिए केक रखा है। रवि जी , लता और लक्षित उसका ही इंतजार कर रहे थे , उन्हें याद था कि आज पृथ्वी का जन्मदिन है। पृथ्वी ने अपना बैग सोफे पर रखा और हाथ धोकर उनकी तरफ चला आया। पृथ्वी अब अपनी वजह से किसी को परेशान करना नहीं चाहता था इसलिए होंठो पर झूठी मुस्कान सजाई और केट काटा , सबसे पहले लता को खिलाया फिर रवि जी और लक्षित को,,,,,,,,,,,,!!
लता ने उसके लिए बहुत सुन्दर शर्ट खरीदा था और रवि जी ने एक बहुत ही सुंदर घडी उसे गिफ्ट की।
लक्षित ने पृथ्वी को एक नया क्रिकेट बेट गिफ्ट किया जिसे पृथ्वी पिछले कई महीनो से लेना चाहता था लेकिन नहीं ले पाया। बेट देखकर पृथ्वी को महसूस हुआ कि पिछले एक महीने से क्रिकेट खेलना तो दूर उसने अपने किसी बेट को छुआ तक नहीं है। लक्षित का दिल रखने के लिए उसने उस से वो बेट ले लिया और फिर सभी साथ बैठकर खाना खाने लगे।
खाना खाने के बाद पृथ्वी अपने फ्लेट पर चला आया। पुरे एक महीने बाद पृथ्वी अपने फ्लेट में आया था लेकिन फ्लेट साफ सुथरा था शायद आज दिन में आकर लता ने किया हो सोचकर पृथ्वी किचन में चला आया। उसने बोतल में पीने का पानी भरा और बालकनी में चला आया। गर्मियों के दिन थे और इस वक्त बालकनी में आती ठंडी हवाएं उसे सुकून पहुंचा रही थी पृथ्वी ने पानी पिया और आसमान की तरफ देखा , चाँद के पास वो एक अकेला सितारा अभी भी चमक रहा था।
पृथ्वी उसे एकटक तब तक देखता रहा जब तक कि उसकी आँखों में आँसू ना भर आये और पृथ्वी ने एकदम से गर्दन झटक दी। पृथ्वी जो अवनि की कहानियाँ पढता था आज ना जाने उसे क्या हुआ वह बुक रेंक की तरफ आया वहा रखा पेपर और पेन उठाया और सोफे पर बैठकर उस पर कुछ लिखने लगा। ये गुण पृथ्वी ने कब और कैसे आया वह खुद नहीं जानता था लेकिन पेन उस कागज पर चलता जा रहा था और उसके मन में जो चल रहा था वह लिखते जा रहा था।
पृथ्वी ने उस कागज पर कुछ लिखा और फिर उसे लेकर बालकनी में चला आया। 10 मंजिला बिल्डिंग के 7वे माले की बालकनी में खड़ा पृथ्वी अपनी ही लिखी उन लाइन्स को गुनगुनाने लगा। उसकी आवाज में एक दर्द था जिसे सुनकर कुछ पल के लिए सब ठहर जाए
“इन दिनों इक शख्स की आदत लगी है बहुत
इन दिनों उसकी मोहब्बत में हूँ मैं
इन दिनों उसकी बड़ी जरूरत है मुझे
इन दिनों उसकी जरूरत हूँ मैं
इन दिनों मुझे नींद कम आती है
मेरे जहन में इक ख्याल चलता है !
वो ठहरेगा जिंदगी में , या सबकी तरहा छोड़ जाएगा
ना जाने क्यों ये सवाल रहता है ?
पास रहे तो आदत उसकी , दूर रहे तो कमी लगे
ये कैसी जद्दोजहद में हूँ मैं !
इन दिनों इक शख्स की आदत लगी है बहुत
इन दिनों उसकी मोहब्बत में हूँ मैं
पृथ्वी इतना ही गा पाया , वह आगे गाता इस से पहले हवा का तेज झोंका आया और वह कागज उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया। वह कागज़ जिस पर पृथ्वी ने अवनि को लेकर अपने मन की भावनाये लिखी थी घूमते हुए नीचे जा गिरा। पृथ्वी ने देखा बैचैन हो गया और दरवाजे की तरफ भागा। वह लिफ्ट के सामने आया लेकिन लिफ्ट बिजी थी , कही वह कागज उड़कर कही और न चला जाये , बर्बाद ना हो जाये , फट ना जाये सोचकर पृथ्वी सीढ़ियों से नीचे जाने लगा।
रात के 11 बज रहे थे लेकिन पृथ्वी को इसकी कोई परवाह नहीं थी उसे तो बस वो कागज चाहिए था। पृथ्वी भागते हुए नीचे आया और अपनी बालकनी के नीचे आकर देखा लेकिन उसे वहा कागज नहीं मिला , पृथ्वी ने इधर उधर ढूंढा लेकिन कही नजर नहीं आया , कागज ना मिलने पर पृथ्वी मायूस होकर जैसे ही जाने लगा हवा में कही से उड़ता हुआ वो कागज आकर उसके मुँह पर लगा। पृथ्वी ने उसे अपने चेहरे से हटाया और आगे की लाइन गाते हुए आगे बढ़ गया
“पहले प्यार में दुनिया जहां की खबर नहीं रहती
आख़री इश्क़ भी शायद ऐसा ही होता है
दुनिया के सामने कठोर बनने वाला
मेरे सीने में सर छुपाकर बच्चो सा रोता है
उसकी आँखें बता रही है उसे मेरी जरूरत है
मेरा दिल कहता है उसकी हसरत में हूँ मैं
इन दिनों एक शख्स की आदत लगी है बहुत
इन दिनों उसकी मोहब्बत में हूँ मैं,,,,,,,,,,,,,,,!!!
पृथ्वी गाते हुए फुटपाथ पर लगी सोसायटी की बेंच पर आ बैठा और उसके बाद उसने न जाने कितनी ही बार उन लाईनो को पढ़ा और हर बार उन्हें पढ़ने के साथ उसका दर्द भी कम होने के बजाय बढ़ता ही चला गया।
सिरोही , राजस्थान
रात का खाना खाने के बाद सुरभि अपने फोन में कोई Kdrama देखने लगी और अवनि अपनी स्टडी टेबल पर आ बैठी। उसने अपने टेबल के दराज को खोलकर देखा अब तक उसमे काफी खत जमा हो चुके थे जो उसने पृथ्वी के लिए लिखे थे। ये दराज शायद अवनि ने पृथ्वी के ही नाम कर दिया था तभी तो इसमें बस उसके लिए लिखे गए ख़त , कोरे कागज , ख़ाली लिफाफे और रंग बिरंगे पेन थे लेकिन आज इस दराज़ में एक ख़ास तोहफा भी रखा था जो पृथ्वी के जन्मदिन पर अवनि ने खरीदा था। अवनि की नजर उस पर पड़ी तो उसने उसे बाहर निकाला खोलकर देखा।
चाँदी में बना “ॐ” जिसे काले धागे में गुंथा गया था ताकि कलाई पर बाँधा जा सके। ये अवनि ने पृथ्वी के लिए लिया था और इसे लेने के पीछे की वजह भी बड़ी ख़ास थी। अवनि जानती थी कि पृथ्वी को महादेव से शिकायत है और ये धागा पृथ्वी की कलाई पर बाँधकर वह उसमें महादेव के प्रति विश्वास जगाना चाहती थी। चाँदी कलाई में चाँदी पहनने की सलाह उन्हें दी जाती है जिन्हे गुस्सा बहुत आता है और पृथ्वी बाबू तो साक्षात् महादेव से गुस्सा थे तो बस उसी गुस्से को शाँत करने के लिए अवनि ने इसे चुना और काला धागा इसलिए कि उसकी मासूमियत और अच्छाई को किसी की नजर ना लगे।
अवनि ने उसे छूकर देखा मुस्कुराई और वापस दराज में रख दिया। अवनि ने सुबह पृथ्वी से कहा था कि वह आज पृथ्वी के लिए ख़त लिखेगी। उसने एक कोरा कागज निकाला और उस पर लिखने लगी। अवनि ने उसे ख़त के जरिये फिर एक बार जन्मदिन की बधाई दी और मन में जो चल रहा था वो सब लिख दिया। आज से पहले अवनि ने जो खत लिखे थे वो सब भावुक होकर लिखे थे लेकिन आज ख़त लिखते हुए अवनि बिल्कुल भी भावुक नहीं थी , वह बहुत ही शांत थी और बड़े ही प्यार से पृथ्वी के लिए ख़त लिख रही थी।
ख़त खत्म हुआ अवनि ने उसे समेटा , लिफाफे में रखा और बंद करके तारीख के साथ दराज में डाल दिया।
दराज बंद करते हुए ना जाने क्यों अवनि का मन हुआ कि आज वह पृथ्वी के लिए एक ख़त और लिखे , कोई कविता या कोई खूबसूरत बात जिसे पढ़कर पृथ्वी मुस्कुराये। उसने एक कोरा कागज और निकाल लिया और बड़े प्यार से उस पर लिखने लगी।
अवनि ने कुछ लाईने लिखी तभी टेबल पर पड़ा पानी का बोतल लेने सुरभि उसकी तरफ आयी और जब उसने अवनि की लिखी लाईनो को पढ़ा तो कहा,”अरे वाह ये तो तुमने बहुत ही अच्छा लिखा है,,,,,,,,,!!”
अवनि ने देखा सुरभि उसके बगल में खड़ी है तो उसने जल्दी से उसे छुपाना चाहा लेकिन सुरभि तो ठहरी सुरभि उसने हाथ बढाकर उस कागज को उठा लिया। अवनि उस से वो कागज लेने कमरे में यहाँ वहा उसके पीछे भागने लगी और जब सुरभि थक गयी तो उसने पलटकर कहा,”स्टेच्यू”
अवनि को रुकना पड़ा हालाँकि वह बोल सकती थी इसलिए उसने कहा,”तुम्हे ऐसे छुपकर किसी के निजी खतों को नहीं पढ़ना चाहिए”
“ख़त होता तो नहीं पढ़ती , पर ये तो कोई कविता लग रही है। मैं समाज के तानो से छलनी,,,,,,,,,,,,,,अह्ह्ह जो भी है , लो अब तुम ही इसे पढ़कर मुझे सुनाओ”,सुरभि ने कागज पर लिखी एक लाइन पढ़ी और कागज अवनि की तरफ बढ़ा दिया।
अवनि ने कागज लिया और कहा,”अगर पढ़ने के बजाय मैं तुम्हे ये गाकर सुनाओ तो कैसा रहेगा ?”
“हहहहह ! क्या सच में , अगर ऐसा है तो फिर मैं इसे तुम्हारी आवाज सुनना चाहूंगी,,,,,,,!!”,सुरभि ने ख़ुशी से चहकते हुए बिस्तर पर बैठकर कहा
अवनि ने कागज पर लिखी लाइन्स देखी और गाने लगी , उसकी आवाज में दर्द नहीं था बल्कि सुकून था , इश्क़ था और था किसी का इंतजार
“मैं समाज के तानों से छलनी मन लिए घूमती हूँ
वो बातों अपनी उन जख्मो की दवा रखता है
वो धीरे धीरे जुड़ता है टुटा मन मेरा
हर टूटे हिस्से के लिए दुआ पढ़ता है
बिखरे मन के साथ इक रोज मुझे भी समेट वो
ना जाने ये कैसी हसरत में हूँ मैं
इन दिनों इक शख्स की आदत लगी है बहुत
इन दिनों उसकी मोहब्बत में हूँ मैं
अवनि ये लाइन गाते हुए इतनी प्यारी लग रही थी कि सुरभि बस उसके चेहरे में खोकर रह गयी जबकि अवनि और पृथ्वी दोनों ही नहीं जानते थे। मीलों दूर एक दूसरे से दूर बैठकर भी आज उन्होंने जो लिखा है वो कही न कही एक दूसरे से जुड़ा है
( क्या महादेव सुनेंगे पृथ्वी की प्रार्थना या अभी बाकि है पृथ्वी की असली परीक्षा ? जिन खतों को अवनि लिख रही है पृथ्वी के लिए क्या वो ख़त कभी पहुंचेंगे पृथ्वी के पास ? क्या अवनि को होने लगा है पृथ्वी से प्यार ? जानने के लिए पढ़ते रहिये “पसंदीदा औरत” मेरे साथ )
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संजना किरोड़ीवाल


90chapter upload kr dijiye mam pls 🙏
90 wala part nhi padha…par 91 part padh kar laga ki Prithvi office gaya hai…aur waha se wapas aa kar wo Mahadev se prarthna krne gaya hai…aur unse Avni ko uski zindagi m dene ko bola hai…pta nhi Mahadev ne kya socha hai jo Avni aur Prithvi ko ek dusre se door kar diya hai…1 se maheena se zyada ho gaya, par Avni aur Prithvi k bech m koi baat nhi Hui hai..kitna ajeeb hai yeh…aur dono ek dusre k liye letter likh rhe hai… umeed hai ki Mahadev ab zarur kuch karenge…aur yeh Prithvi ki dadi maa aai ki nhi?
90 part nahi aaya hai 91 hai 90 chapter upload kar dijiyega