Manmarjiyan Season 4 – 53

Manmarjiyan Season 4 – 53

Manmarjiyan Season 4
Manmarjiyan Season 4 by Sanjana Kirodiwal

गुड्डू बस से चकिया के लिए निकल गया जो कि चंदौली से बस आधा घंटे की दूरी पर था। लवली ने उसे मनोज का नंबर और उसके घर का पता दिया था इसलिए गुड्डू बस स्टेण्ड उतरा और मनोज के घर की तरफ बढ़ गया। अँधेरा था फिर भी गुड्डू ने अपना मुँह गमछे से ढक रखा था जिस से गांव में कोई उसे लवली समझकर रोक ना ले। मनोज के घर का पता पूछते पाछते गुड्डू मनोज के घर पहुंचा और दरवाजा खटखटाया।

कुछ देर बाद मनोज ने दरवाजा खोला तो सामने गमछे से मुँह ढके आदमी को देखकर कहा,”का भैया ! कौन हो तुमहू और का काम है ?”
गुड्डू ने गमछा हटाया , सामने खड़े गुड्डू को लवली समझकर मनोज ने जल्दी से उसका हाथ पकड़ा और उसे अंदर खींच लिया। मनोज ने दरवाजा बंद किया और गुड्डू की तरफ पलटकर कहा,”आप हिया का कर रहे है लवली भैया ? पुरे गांव मा मंगेशवा ने अपने आदमियों को बैठा रखा है ,उन लोगो ने आपको देखा तो नाही ?”

“जे शायद हमको लवली समझ रहा है”,गुड्डू ने मन ही मन कहा और मनोज को देखकर ना में गर्दन हिला दी। मनोज गुड्डू को लवली समझकर उसके पास आया और कहा,”आपको हिया नाही आना चाहिए था लवली भैया ,आप नाही जानते आपकी जान को हिया कित्ता खतरा है ?”
“हम हिया बिंदिया के लिए आये है मनोज और उसे लेकर ही वापस जायेंगे”,गुड्डू ने विश्वास से भरकर कहा

कौन बिंदिया की बात करे है आप लवली भैया ? अरे उह्ह्ह बिंदिया जोन आपके पियार को भूलकर ख़ुशी ख़ुशी किसी और से शादी करने जा रही है”,मनोज ने गुस्से से कहा
“जे तुम का कर रहे हो मनोज ?”,गुड्डू ने हैरानी से कहा
“हमहू सच कह रहे है भैया ! आज ही देखे रहे हमहू कैसे ख़ुशी ख़ुशी किसी और के नाम की मेहँदी लगवाय रही थी बिंदिया भाभी , सबके बीच बैठकर हंस रही थी , बतियाय रही थी। ओह्ह्ह का देखकर तो लग रहा था जैसे उह्ह जे सादी से बहुते खुश है भैया”,मनोज ने कहा

“नहीं मनोज तुमको जरूर कोनो गलतफहमी हुई है बिंदिया ऐसा नाही कर सकती”,गुड्डु ने कहा  
“अरे आपके सर की कसम भैया हमहू खुद अपनी आँखों से देखे है , ओह्ह्ह का कोनो फर्क नाही पड़ रहा भैया उह्ह्ह ललनवा के साले के लड़के से शादी करने को तैयार है”,मनोज ने अफ़सोस भरे स्वर में कहा
“का लल्लन का रिश्तेदार ?”,गुड्डू ने हैरानी भरे स्वर में कहा क्योकि आखरी बार वह लल्लन से रामनगर की पहाड़ी पर मिला था और उसके बाद मंगेश और लल्लन दोनों को पुलिस ले गयी थी।

“हाँ भैया लल्लन के साले का लड़का , वही लल्लन जो बिंदिया के बापू का जिगरी दोस्त है,,,,,,,,,,,बिंदिया भाभी ने भी जे शादी के लिए हाँ कहकर आपको धोखा दिया है भैया,,,,,,,,,,,,हमाओ तो जे जानकर ही खून खौल रहो”,मनोज ने गुस्से से कहा
“शांत हो जाओ मनोज ! सच का है जे जानने के लिए हमे बिंदिया से मिलना ही पडेगा”,गुड्डू ने कहा
“नाही भैया ! हमहू आपको हुआ नाही जाने देंगे ,आपका हुआ जाना खतरे से खाली नाही है”,मनोज ने कहा

“हमे कुछ नाही होगा मनोज ! तुम्हे हमायी मदद करनी होगी कैसे भी करके बिंदिया को घर के पीछे ले आओ एक बार हम ओह्ह्ह से बात कर ले ओह्ह्ह्ह के बाद ही कुछो फैसला कर पाए है”,गुड्डू ने कहा
“लेकिन भैया,,,,,,,!!!”,मनोज ने कहा वह आगे कुछ कहता इस से पहले गुड्डू ने उसकी बात काटकर कहा,”मनोज ! हम पर भरोसा रखो हम हिया सब ठीक करने आये है , अगर बिंदिया ने अपने मुँह से जे कह दिया कि उह्ह्ह जे शादी अपनी मर्जी से कर रही है तो हम हिया से चले जाएंगे”

गुड्डू की बात सुनकर मनोज सोच में पड़ गया और कहा,”ठीक है भैया ! अभी तो ओह्ह्ह के घर मा सब मेहमान जमा है , थोड़ी देर बाद संगीत और नाच गाना शुरू होगा तब सब ओह्ह्ह मा व्यस्त हो जाही है तब हम बिंदिया को लेकर आ जायेंगे आप मिल लेना,,,,,,,,,,,,,लेकिन तब तक आप बाहिर नाही निकलना”
“ठीक है लेकिन मनोज,,,,,,,,,,,!!”,गुड्डू ने कहा
“का भैया ?”,मनोज ने पूछा
“इत्ती दूर से सफर करके आये है तो हमको बहुत प्यास लगी है और भूख भी”,गुड्डू ने मासूमियत से कहा

“अरे माफ़ करना भैया ! हमहू अभी आपके लिए कुछो खाने को ले आते है”,कहकर मनोज वहा से चला गया और गुड्डू ने राहत की साँस लेकर खुद से कहा,”जे तो गड़बड़ हो गयी ! लवली भैया हमे हिया बिंदिया भाभी को उठाने के लिए भेजे रहय और बिंदिया भाभी किसी और से शादी करने जा रही है। इह बात अगर लवली भैया को पता चली तो का गुजरी है ओह्ह्ह पे , नाही नाही हमहू पहले बिंदिया भाभी से मिलेंगे ओह्ह्ह के बाद ही लवली भैया से बात करेंगे”

मिश्रा जी का घर , कानपूर
लवली को सजा देकर मिश्रा जी को भी अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन वे नहीं चाहते थे लवली भी गुड्डू और गोलू की तरह गलत चीजों में फसे। शाम की पूजा के बाद मिश्राइन शगुन के साथ मिलकर किचन मे खाना बनाने लगी। भुआ और फूफा हॉल में बैठे थे ,घर में उन दोनों से कोई बात नहीं कर रहा था इसलिए दोनों एक ही दिन में उकता गए। भुआ तो टीवी पर अपना फेवरिट सीरियल देखकर अपना मन बहला रही थी लेकिन फूफा के पास करने को कुछ था नहीं इसलिए उठे और घर के बाहर चले आये।

मोहल्ले के आते जाते लोग फूफा को देखकर नमस्ते करते और आगे बढ़ जाते आखिर फूफा थे तो इस घर के दामाद ही ना।
“अरे आदर्श बाबू ! आप कब आये ?”,घर के चबूतरे पर खड़े रौशनी के पिताजी ने पूछा
“मुसीबत बताकर थोड़े आती है”,घर के दरवाजे पर खड़े मिश्रा जी ने थोड़ा ऊँचे स्वर में कहा
आदर्श फूफा ने सुना तो पलटे और कहा,”तो आप का हमे मुसीबत कह रहे है ?”

“नहीं ! हमहू तो फोन पर बात कर रहे है”,कहते हुए मिश्रा जी ने अपना फोन कान से लगाया और वहा से चले गए। ये देखकर आदर्श बाबू का मुँह बन गया और वे बड़बड़ाये,”साला एक जे ही घर मा इज्जत नाही है हमायी बाकी पुरो कानपूर हमे सलाम करत रहे”
“अरे का आदर्श बाबू कहा खो गए ? लगता है मिश्रा जी से अनबन चल रही है आपकी”,रौशनी के पिताजी ने आदर्श फूफा को छेड़कर कहा

“हमायी अनबन चल रही है के नाही इह हम तुमको काहे बताये ? तुमहू सरपंच लगे हो,,,,,,,,,,,जाके चुपचाप अपना काम करो”,आदर्श फूफा ने उखड़े स्वर में कहा और अंदर चले गए।
रौशनी के पिताजी ने फूफा को एक नजर देखा और कहा,”ये साले सब फुफाओ का जे ही परोब्लम है,,,,,,,,,,,,भक्क”

आदर्श फूफा मन बहलाने के लिए घर से बाहर गए थे और उखड़े मूड के साथ वापस अंदर चले आये। वे आकर सीढ़ियों पर बैठ गए और मिश्रा जी की तरफ देखकर कहा,”जे घर मा तो हमें कबो इज्जत नही मिली अब ससुरे बाहिर वाले भी हमको बेइज्जत करने लगे है”
मिश्रा जी हाथो में धूपबत्ती लिए घर में चक्कर लगा रहे थे और कुछ देर बाद आदर्श फूफा के सामने से गुजरते हुए कहा,”हरकतों मा सुधार नाही और दूल्हा मांगे पेप्सी कोला”
“जे का कहावत हुई ?”,आदर्श फूफा ने चिढ़कर कहा

मिश्रा जी ने सामने से आती मिश्राइन को धुप बत्ती थमाई और अंदर जाकर मंदिर में लगाने का इशारा कर दिया। मिश्राइन वहा से चली गयी तो मिश्रा जी अपने तख्ते पर आकर बैठे और कहा,”कहावत नाही सच्चाई है आदर्श बाबू ! जब तक आप अपनी आदतें सुधार नाही लेते मान सम्मान कैसे मिली है तोह का,,,,,,,,,!!!”
“ए मिश्रा जी ! बहुत जियादा हो रहा है आपका , अरे कबो जौनपुर मा आकर देखो का इज्जत और मान सम्मान है हमाओ”,फूफा ने बिदककर कहा

“हाँ तो फिर जौनपुर काहे नाही जाते , हिया काहे पड़े है ?”,मिश्रा जी ने कहा
“पड़े है ? पड़े है से का मतलब है आपका ? अरे जे हमायी धर्मपत्नी का मायका है और हम ओह्ह्ह के घरवाले है हम जब चाहे तब हिया आ सकते है। अब का आपसे परमिशन लेकर आना पडेगा हमे ?”,आदर्श फूफा ने मिश्रा जी के सामने आकर कहा

मिश्रा जी समझ गए कि आदर्श फूफा का अकेले टाइमपास नहीं हो रहा इसलिए वे जानबूझकर बहस कर रहे है। मिश्रा जी ने आदर्श फूफा के अरमानो पर पानी फेरकर कहा,”अरे आदर्श बाबू ! आप तो खामखा गर्म हो गए , कुछो ठंडा मँगवाय दे आपके लिए,,,,,,,,,,,,,,ए वेदी बिटिया जरा दुइ ठो गिलास मा पेप्सी कोला तो लाओ बिटिया”
आदर्श फूफा ने सुना तो हैरानी से मिश्रा जी को देखने लगा। मिश्रा जी एकदम से उनपर इतना प्यार क्यों दिखाने लगे ? दाल में जरूर कुछ काला है सोचकर फूफा ने कहा,”नहीं नहीं हम कोला पेप्सी नाही पिएंगे”

“अरे काहे ? हमहु मंगवाए है एक ठो गिलास तो पीना ही पडेगा , ल्यो बिटिया ले भी आयी। आओ बिटिया एक ठो गिलास फूफा को देओ”,मिश्रा जी ने वेदी से कहा तो वेदी ने पेप्सी से भरा गिलास फूफा की तरफ बढ़ा दिया। गिलास में भरी पेप्सी और मिश्रा जी की मंद मंद मुस्कान देखकर फूफा को  डाउट होने लगा कही लवली ने जैसे खाने में दवा मिलाई थी वैसे ही मिश्रा जी ने कही पेप्सी में तो कुछ नहीं मिलाया सोचकर फूफा ने कहा,”हम सब समझते है मिश्रा जी”

“का समझते है आप ?”,मिश्रा जी ने पूछा
“जे ही कि इह पेप्सी मा जरूर कुछो गड़बड़ है,,,,,,सुबह उह्ह्ह साला लवली जैसे खाने मा दवा मिलाय रहय आपका कोनो भरोसा नहीं का पतो जे मा जहर मिलाय दिए हो”,आदर्श फूफा ने कहा
“आप पर तो जहर भी असर नहीं करेगा फूफा”,वेदी ने दबे स्वर में कहा तो मिश्रा जी ने वेदी की तरफ देखा। वेदी समझ गयी इसलिए दूसरा गिलास मिश्रा जी को  थमाकर कहा,”पिताजी ! जे आपके लिए , हम जाते है शायद अम्मा हमे बुला रही है”

वेदी के जाने के बाद मिश्रा जी ने जैसे ही पीने के लिए गिलास मुँह की ओर बढ़ाया आदर्श फूफा ने कहा,”रुको”
मिश्रा जी रुक गए तो आदर्श फूफा ने अपना गिलास उनकी तरफ बढ़ाकर कहा,”हमको अब जे घर के लोगो पर भरोसा नाही रहा है,,,,,,,,,आप वाला गिलास हमे दयो और आप जे पीओ”
मिश्रा जी ने सुना तो अफ़सोस में अपना सर झटका और अपना गिलास आदर्श फूफा की तरफ बढा दिया।

फूफा ने अपना गिलास मिश्रा जी को दे दिया तो मिश्रा जी पेप्सी पीने लगे और ये देखकर आदर्श फूफा ने मन ही मन कहा,”अब अगर जे पेप्सी मा कुछो मिला भी होगा तो ओह्ह का असर होगा मिश्रा पर,,,,,,,,,,देखा हमाये दिमाग का कमाल,,,,,,,,,,!!”
फूफा मुस्कुराये उन्हें मुस्कुराते देखकर मिश्रा जी ने बुरा सा मुँह बनाया और अपना गला पकड़ लिया जैसे उस पेप्सी में कुछ मिला हो।

ये देखकर फूफा हैरान रह गए और मिश्रा जी को देखने लगे तो मिश्रा जी अगले ही पल नार्मल होकर कहा,”कुछो नाही हुआ,,,,,,,,,,,पता नाही जे सक करने की बिमारी कब जाएगी ?”
घूमते घामते भुआ वहा आ पहुंची उन्होंने फूफा के हाथ में पेप्सी से भरा गिलास देखा तो कहा,”हिया आ हो रहा है ?
“आपको हम पर भरोसा नाही है ना तो जे राजकुमारी को पिलाकर देख ल्यो , आप दामाद है पर जे तो हमायी अपनी बहिन है ना”,मिश्रा जी ने उठते हुए कहा और वहा से चले गए

आदर्श फूफा सोच में पड़ गए और फिर गिलास भुआ की तरफ बढ़ाकर कहा,”ए कोमलिया की अम्मा ! ज़रा इह पीकर तो बताना”
राजकुमारी भुआ ने गिलास लिया और एक साँस में गट गट पूरी पेप्सी पी गयी। फूफा ने मुँह फाडे भुआ को देखता ही रह गया। भुआ ने डकार ली और फूफा की तरफ देखकर कहा,”बहुते बढ़िया थी बस थोड़ा ठंडा कम थी”

फूफा ने भुआ को खा जाने वाली नजरो से देखा और कहा,”का अकाल मा पैदा हुई थी ? अरे हमहू सिर्फ चखने के लिए दिये रहय तुमहू पूरा पी गयी,,,,,,,!!!”
भुआ ने सुना तो झेंपते हुए फूफा की तरफ देखा तभी दरवाजे पर खड़े लड़के ने आवाज लगाई,”आनंद मिश्रा का घर जे ही है का  

फूफा ने भुआ को अंदर जाने का इशारा किया और खुद लड़के के पास चले आये और कहा,”हाँ ! जे ही है बोलो का काम है ?”
“इहह् एक ठो लिफाफा है इह देना था”,लड़के ने लिफाफा आदर्श फूफा को देकर कहा
“जे किसने भेजा है ?”,आदर्श फूफा ने लिफाफे को उलट पलट कर देखते हुए कहा जिस पर कोई नाम पता नहीं लिखा था।

“इह चकिया से आया है हिया देने को कहा था , हम चलते है हमायी बस निकलने वाली है”,लड़के ने कहा और वहा से चला गया
आदर्श फूफा ने जैसे ही चकिया का नाम सुना उनके होंठो पर मुस्कान फ़ैल गयी और उन्होंने लिफाफे को देखकर कहा,”अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे”

( क्या गुड्डू बताएगा मनोज को अपना सच या उसके सामने रहेगा लवली बनकर ? क्या गुड्डू को अपने सामने देखकर बिंदिया बदल देगी अपना फैसला ? चकिया से आये लिफाफे को लेकर क्या आदर्श फूफा करने वाले है लवली और मिश्रा जी परेशान ? जानने के लिए पढ़ते रहे “मनमर्जियाँ सीजन 4” मेरे साथ )

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संजना किरोड़ीवाल

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Manmarjiyan Season 4 by Sanjana Kirodiwal
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मिश्रा जी समझ गए कि आदर्श फूफा का अकेले टाइमपास नहीं हो रहा इसलिए वे जानबूझकर बहस कर रहे है। मिश्रा जी ने आदर्श फूफा के अरमानो पर पानी फेरकर कहा,”अरे आदर्श बाबू ! आप तो खामखा गर्म हो गए , कुछो ठंडा मँगवाय दे आपके लिए,,,,,,,,,,,,,,ए वेदी बिटिया जरा दुइ ठो गिलास मा पेप्सी कोला तो लाओ बिटिया”
आदर्श फूफा ने सुना तो हैरानी से मिश्रा जी को देखने लगा। मिश्रा जी एकदम से उनपर इतना प्यार क्यों दिखाने लगे ? दाल में जरूर कुछ काला है सोचकर फूफा ने कहा,”नहीं नहीं हम कोला पेप्सी नाही पिएंगे”

मिश्रा जी समझ गए कि आदर्श फूफा का अकेले टाइमपास नहीं हो रहा इसलिए वे जानबूझकर बहस कर रहे है। मिश्रा जी ने आदर्श फूफा के अरमानो पर पानी फेरकर कहा,”अरे आदर्श बाबू ! आप तो खामखा गर्म हो गए , कुछो ठंडा मँगवाय दे आपके लिए,,,,,,,,,,,,,,ए वेदी बिटिया जरा दुइ ठो गिलास मा पेप्सी कोला तो लाओ बिटिया”
आदर्श फूफा ने सुना तो हैरानी से मिश्रा जी को देखने लगा। मिश्रा जी एकदम से उनपर इतना प्यार क्यों दिखाने लगे ? दाल में जरूर कुछ काला है सोचकर फूफा ने कहा,”नहीं नहीं हम कोला पेप्सी नाही पिएंगे”

मिश्रा जी समझ गए कि आदर्श फूफा का अकेले टाइमपास नहीं हो रहा इसलिए वे जानबूझकर बहस कर रहे है। मिश्रा जी ने आदर्श फूफा के अरमानो पर पानी फेरकर कहा,”अरे आदर्श बाबू ! आप तो खामखा गर्म हो गए , कुछो ठंडा मँगवाय दे आपके लिए,,,,,,,,,,,,,,ए वेदी बिटिया जरा दुइ ठो गिलास मा पेप्सी कोला तो लाओ बिटिया”
आदर्श फूफा ने सुना तो हैरानी से मिश्रा जी को देखने लगा। मिश्रा जी एकदम से उनपर इतना प्यार क्यों दिखाने लगे ? दाल में जरूर कुछ काला है सोचकर फूफा ने कहा,”नहीं नहीं हम कोला पेप्सी नाही पिएंगे”

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