Pasandida Aurat – 88
Pasandida Aurat – 88

लता की दी कसम में सामने मजबूर होकर पृथ्वी ने अवनि को खुद से दूर कर दिया। रातभर उसे नींद नहीं आयी और सुबह होते होते पलकें भारी होने लगी और वह नींद के आगोश में चला गया। लता की तबियत खराब थी इसलिए रवि जी ने होटल से दो दिन की छुट्टी ले ली और लता से आराम करने को कहकर खुद किचन में चले आये। लक्षित ने उन्हें अकेले काम करते देखा तो वह भी उनकी मदद करने किचन में चला आया। पृथ्वी की एक बात की वजह से घर का पूरा माहौल बदल चुका था।
जिस घर में सुबह सुबह लता की आवाज गूंजती थी , रवि जी की हंसी के ठहाके गूंजते थे और लक्षित का “आई मेरा बैग कहा है ? , आई मेरी बुक नहीं मिल रही , आई मेरा जुराब नहीं मिल रहा” गूंजता था आज उसी घर में सन्नाटा पसरा था। रवि जी पृथ्वी से गुस्सा थे और लक्षित तो कल शाम से पृथ्वी से बात तक नहीं कर रहा था। पृथ्वी की तबियत ठीक थी बस उसके पैर और हाथ में प्लास्टर था जबकि सर की पट्टी खुल चुकी थी। वह सो रहा था इसलिए रवि जी ने उसे नहीं जगाया।
लता के पास बैठकर उन्होंने उसे चाय नाश्ता और दवा दी और आराम करने को कहा। लता के जहन में अभी भी पृथ्वी का विरोध चल रहा था , कैसे कल शाम वह एक लड़की के लिए पुरे घरवालों के खिलाफ तक जाने को तैयार हो गया। लता का मन घबरा रहा था कि कही पृथ्वी सच में कुछ ऐसा न कर दे और इसी डर के चलते उन्होंने पृथ्वी को अपनी कसम दे दी,,,,,,लता को विश्वास था कि पृथ्वी उसकी बात कभी नहीं टालेगा और धीरे धीरे उस लड़की को भूल जाएगा।
लता अवनि को नहीं जानती थी , ना वे कभी उस से मिली थी ना ही उनकी कभी उस से बात हुई थी फिर भी लता के मन में अवनि को लेकर नफरत पैदा होने लगी थी , एक लड़की के लिए आज उनका अपना बेटा बगावत पर उतर आया लता ये बात बर्दास्त नहीं कर पा रही थी लेकिन वे भी अपनी जगह सही थी ऐसे कैसे वे किसी भी लड़की को इस घर में बहू बनकर आने दे सकती थी।
सिरोही , राजस्थान
सुबह अवनि की आँख खुली तो उसे अपनी आँखों में दर्द महसूस हुआ साथ ही उसका बदन भी टूट रहा था। अवनि कमरे से बाहर आयी , वाशबेसिन के सामने आकर अपना मुँह धोया तो नजर अपने चेहरे पर पड़ी , एक रात में ही अवनि का चेहरा मुरझा गया और चेहरे की रंगत पीली पड़ गयी। उसकी आँखे रोने की वजह से सूज चुकी थी और हलकी लालिमा लिए हुए थी। अवनि ने अपने बालों को समेटा और मुँह पोछकर हॉल में चली आयी
सुरभि ने देखा अवनि उठ चुकी है तो वह अपने और अवनि के लिए चाय लेकर हॉल में चली आयी। सुरभि ने चाय का कप अवनि की तरफ बढ़ा दिया और खुद नीचे फर्श पर बैठ गयी। अवनि ख़ामोशी से चाय पीने लगी तो सुरभि ने कहा,”तुम ठीक हो ना ?”
“हम्म्म,,,,,ठीक होने की आदत डालनी पड़ेगी सुरभि,,,,,,!!”,अवनि ने दार्शनिक अंदाज में कहा
सुरभि ने सुना तो उसे दुःख हुआ , अवनि का ध्यान बीती रात की बातो से भटकाने के लिए सुरभि ने कहा,”मेरे ऑफिस में जितना भी स्टाफ है उनमे मैं सबसे कम उम्र की इम्प्लॉय हूँ,,,,,,इसलिए लंच टाइम में सब मुझे अपने टिफिन से खाने के लिए पूछते रहते है। उन लोगो के साथ तो मुझे ऐसे लगता है जैसे मैं स्कूल में लंच कर रही हूँ,,,,,,,,,हाहाहाहाहा”
अवनि ने सुना तो मुस्कुरा दी और कहा,”अच्छे कलीग्स है , तुम्हे भी लंच में उन सब के लिए कुछ लेकर जाना चाहिए”
“हाँ लेकिन क्या ? मुझे तो कुछ अच्छा बनाना भी नहीं आता,,,,,,,,किसी दिन तुम अपने हाथो से पाव भाजी बनाना मैं सबके लिए वो लेकर जाउंगी , मेरी थोड़ी तारीफ हो जाएगी और सीनियर मुझसे इम्प्रेस भी हो जायेंगे,,,,,,वैसे भी तुम बहुत अच्छी पाव भाजी बनाती हो”,सुरभि ने चाय पीते हुए कहा
सुरभि के मुँह से पाव भाजी का नाम सुनकर अवनि को पृथ्वी की कही बात याद आ गयी
“मैडम जी ! आपके पुरे राजस्थान में मुझसे बेहतर पाव भाजी कोई नहीं बना सकता , आप जब मुंबई आएँगी ना तो मैं आपको अपने हाथो से बनाकर खिलाऊंगा,,,,,,,,,,वैसे आप परमिशन देंगी तो मैं अपने हाथो से भी खिला दूंगा,,,,,,!!”
पृथ्वी की बात याद आते ही अवनि उदास हो गयी और आँखों में नमी तैर गयी। सुरभि ने देखा तो समझ गयी कि अनजाने में उसने अवनि को पृथ्वी की याद दिला दी है इसलिए वह उठी और कहा,”ये लो तुम से बात करने के चक्कर में मैं गैस पर रखा दूध भूल ही गयी , अभी गिरने ही वाला था बचा लिया मैंने”
सुरभि की बात से अवनि की तन्द्रा टूटी और उसने एक ठंडी आह भरकर बालकनी की तरफ देखा , वह पौधा जो अवनि पुराने घर से लेकर आयी थी उस पर लगा गुलाब अभी तक खिला हुआ था जबकि पिछले 4 दिन से अवनि ने उसमे पानी तक नहीं दिया था। अवनि ख़ामोशी से उसे देखते रही। चाय खत्म कर वह नहाने चली गयी। नहाकर वापस आयी और बैंक जाने के लिए तैयार होने लगी।
अवनि ने अपना बैग उठाया उसमे जरुरी सामान रखा और टेबल पर रखे अपने फोन को उठाकर जैसे ही बैग में रखने लगी ना जाने क्यों अवनि के मन में एक उम्मीद जगी। बाकि जगह तो उसने पृथ्वी को ब्लॉक कर दिया था इसलिए उसने फोन में मेल चेक किया इस उम्मीद में कि हमेशा की तरह पृथ्वी ने उसे मेल किया होगा लेकिन अगले ही पल अवनि पहले से ज्यादा उदास हो गयी।
पृथ्वी का कोई मेल नहीं आया था। अवनि ने हताश होकर फोन बैग में रख लिया। अवनि अपने बैंक चली गयी और सुरभि अपने पोस्ट ऑफिस के लिए निकल गयी। अवनि के साथ जो कुछ भी हो रहा था उसमे बस अच्छी बात ये थी कि उसके पास एक नौकरी थी। बैंक आकर अवनि ने खुद को काम में व्यस्त कर लिया लेकिन पृथ्वी की यादों से वह खुद को दूर नहीं कर पायी। उसे पृथ्वी की बातें , उसकी शरारतें , उसका मजाक , उसका चिढ़ना , अवनि के रूठने पर उसका प्यार से मनाना , अनचाही बात सुनकर मुँह बनाना , अवनि को बार बार शादी के लिए पूछना और अवनि के मना करने पर उसका बुरा मानने के बजाय मुस्कुराना ,
अवनि को सब रह रह कर याद आ रहा था। दिन में कितनी ही बार अवनि ने अपना फोन चेक किया , जब भी फोन बजता अवनि जल्दी से ये सोचकर उसे देखती कि पृथ्वी का मेल होगा और हर बार निराशा उसके हाथ लगती। अवनि का मन बहुत उदास था और ये उदासी उसके काम में देखने को भी मिली , आज ना जाने कितनी ही बार उसने गलती की और इसके लिए मैनेजर ने उसे डाँट भी लगाई। शाम में अवनि घर चली आयी। सुरभि भी घर आ चुकी थी
लेकिन अवनि खामोश , सुरभि चार बातें बोलती तो अवनि एक बात बोलती , अवनि का मूड ठीक करने के लिए सुरभि उसे लेकर बाहर चली गयी। बाहर आकर भी अवनि को अच्छा नहीं लगा तो सुरभि उसे लेकर मंदिर चली आयी , मंदिर आकर भी अवनि का मन उदास ही था , कुल मिलाकर उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था और अँधेरा होने से पहले दोनों घर लौट आयी। अवनि दुखी थी इसलिए सोफे पर आकर लेट गयी और कुछ देर बाद उसे नींद आ गयी।
पृथ्वी का घर , मुंबई
दिनभर पृथ्वी उदास अपने कमरे में बैठा रहा। उसका किसी से बात करने का मन नहीं था , दिनभर में ना जाने कितनी ही बार उसने अपने फोन को उठाया और अवनि को भेजे आखरी मैसेज पढ़े और उदास हुआ। कितनी ही बार अपना मेल बॉक्स खोला इस उम्मीद में कि उसने ना सही अवनि ने तो उसे कोई मेल किया होगा लेकिन अवनि की तरफ से पृथ्वी को कोई मेल नहीं था। नकुल ने पृथ्वी को फोन किया लेकिन पृथ्वी ने उस से बात नहीं की , दोस्तों के मैसेज आये लेकिन पृथ्वी ने किसी को जवाब देना तो दूर किसी का मैसेज खोलकर भी नहीं देखा , उसे बस अवनि की चिंता थी ,
उसे इस बात का अहसास था कि ये सब के बाद अवनि एक बार फिर टूट जाएगी। जो विश्वास उसने खुद को लेकर अवनि के मन में जगाया था वो फिर डगमगा जाएगा। पृथ्वी लता की कसम के आगे मजबूर था और अवनि भी कही ना कही लता की उसी कसम को बरकरार रख रही थी पर इसमें अगर सबसे ज्यादा तकलीफ किसी को हो रही थी तो वो थे अवनि और पृथ्वी,,,,,,,,,,,,दोनों ही अपने अपने शहर में दुखी थे , हताश थे और टूटे हुए थे।
शाम में जयदीप पृथ्वी से मिलने घर आया। जयदीप जानता था कि पृथ्वी अवनि से मिलने राजस्थान गया है लेकिन पृथ्वी के घरवालों के सामने वह उस से कुछ पूछ भी नहीं पाया। उसने पृथ्वी को ठीक होने तक ऑफिस आने से मना कर दिया और आराम करने को कहा। पृथ्वी का उदास चेहरा और बुझी आँखे देखकर जयदीप समझ गया कि जरूर पृथ्वी के साथ कुछ गड़बड़ हुई है लेकिन अभी उसे ये सब पूछना ठीक नहीं लगा और वह चला गया।
दिन गुजरने लगे और देखते ही देखते दो हफ्ते निकल गए। पृथ्वी के घर का माहौल धीरे धीरे पहले जैसा होने लगा। घर में लता की आवाज पहले की तरह गूंजने लगी , रवि जी के ठहाके भी पहले की सुनाई पड़ते और लक्षित भी पहले की तरह ही लता से अपने सामान के बारे में पूछता रहता बस कुछ बदला था तो वो था पृथ्वी,,,,,,,,,,,,,इन दो हफ्तों में पृथ्वी बदल चुका था , ना वह पहले की तरह मुस्कुराता , ना हँसता , ना किसी से ज्यादा बात करता और लता से बहस करना तो जैसे उसने छोड़ ही दिया था।
वह दिनभर ऑफिस का काम करता , खाने की थाली में जो परोसा जाता बिना किसी शिकायत के खा लेता , ना घर से बाहर जाता ना ही बाहर से आने वालो से मिलता , नकुल से भी थोड़ी बहुत बात करता और फोन रख देता। जयदीप ने भी कई बार पृथ्वी से बात करने की कोशिश की लेकिन ऑफिस के काम के अलावा पृथ्वी उस से कोई बात नहीं करता था। ऑफिस का काम नहीं होता तो वह अपने कमरे में बिस्तर पर बैठा कमरे की दिवार पर लगे कैलेंडर को देखता रहता ,
हर रोज गुजरने वाले दिन के साथ वह उस कैलेंडर की एक तारीख पर क्रॉस का निशान लगाता रहता। एक उम्मीद अब भी उसके मन में कही दबी थी। अवनि से हुई पहली बातचीत से लेकर अब तक के सारी बातें मैसेज के रूप में उसके फ़ोन में थी , अवनि के भेजे कितने ही वौइस् नोट उसने सेव कर रखे थे , अवनि की हर तस्वीर को आज भी अपने फोन की गेलेरी में सहेज कर रखा था।
जब उसकी बहुत याद आती तब वह पुराने मैसेज पढता , उसके वौइस् नोट सुनता और नम आँखों के साथ उसकी तस्वीरों को निहारता रहता। वह रातभर जागता और जब नींद नहीं आती तो अवनि के भेजे उन्ही वौइस् नोट को सुनते हुए सो जाता,,,,,,,,,,,उसके पास अब बस यही कुछ चीजे बची थी जिनके जरिये वह अवनि को याद रख रहा था।
सिरोही , राजस्थान
ये दो हफ्ते कैसे गुजरे इसका अहसास अवनि को था , ऐसा कोई दिन नहीं गया जब उसने अपना मेल बॉक्स चेक ना किया हो , जब पृथ्वी के बारे में ना सोचा हो।मुस्कुराना तो जैसे वह भूल ही चुकी थी फिर भी सुरभि कोशिश करती कि अपनी बातो से उसे हंसा सके। अवनि अगर हंसती भी तो उसकी आँखे नम हो जाती और ये बात सुरभि के लिए और भी तकलीफदेह थी।
अवनि चाहकर भी पृथ्वी को भूल नहीं पायी और कैसे भूलती वह उसके हर पल में शामिल जो था। एक शाम घर आते हुए अवनि को सुरभि का फोन आया और उसने अवनि को कुछ ताज़ा सब्जिया लेकर आने को कहा। अवनि ने रास्ते से कुछ सब्जिया खरीदी और जैसे ही उसकी नजर ठेले पर रखे करेले पर पड़ी तो उस पृथ्वी की कही बात याद आ गयी
“आप अगर अपने हाथ से बनाकर खिलाएंगी तो मैं जहर भी खा लूंगा मैडम जी , करेला क्या चीज है”
अवनि मुस्कुराई और अगले ही पल उसे पृथ्वी की कही एक और बात याद आ गयी
“मैडम जी ! देखना एक दिन आप मुझे बहुत याद करोगे”
और ये बात याद आते ही अवनि की आँखों में आँसू भर आये , सच ही तो कहा था पृथ्वी ने पिछले 15 दिन से अवनि उसे याद ही तो कर रही थी। अवनि भारी मन के साथ घर चली आयी।
रात के खाने के बाद अवनि अपनी स्टडी टेबल पर आ बैठी , उसने दराज में से एक कोरा खत निकाला और पृथ्वी के लिए लिखने लगी। सुरभि लेपटॉप पर अपना काम कर रही थी। खत लिखते हुए अवनि की नजर आज की तारीख पर पड़ी और उसने उंगलियों पर आगे की तारीख गिनी , जिस तरह पृथ्वी हर रोज कैलेंडर पर छपी तारीख मिटा रहा था वैसे ही अवनि भी उन तारीखों को उंगलियों पर गिन रही थी। सुरभि ने अवनि को अपनी उंगलियों पर कुछ गिनते देखा और उदास हो गयी एक वही तो थी जो अवनि का दर्द समझ पा रही थी लेकिन चाहकर भी उसके लिए कुछ कर नहीं सकती थी।
अवनि ने खत लिखा , उसे लिफाफे में बंद किया और उस पर आज की तारीख लिखकर टेबल के दराज में रख दिया। उसने अपना लेपटॉप खोला और अपनी किसी अधूरी किताब पर काम करने लगी। अवनि देर रात तक अपना काम करती रही और फिर सोने चली गयी।
देखते ही देखते एक हफ्ता और गुजर गया। सुरभि के साथ से अवनि ने खुद को सम्हाल लिया बस फर्क इतना था कि अब वह खुद को पहले से ज्यादा व्यस्त रखती थी , पहले की तरह हंसती मुस्कुराती नहीं थी और सपने देखना तो जैसे छोड़ ही चुकी थी। उसने अपनी पूरी जिन्दगी अब महादेव के भरोसे छोड़ दी। दिनभर वह बैंक के कामों में खुद को व्यस्त रखती और घर आने के बाद अपनी किताब लिखती।
पृथ्वी के ख्याल अब भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे लेकिन अब अवनि ने उन ख्यालो में तकलीफ के बजाय सुकून ढूंढ लिया और जब भी उसे पृथ्वी की बहुत ज्यादा याद आती या उसे कुछ बताने का दिल करता तो वह उसके लिए खत लिखती। वह बड़े प्यार से उस खत को लिखती , लिफाफे में बंद करती और लिफाफे पर तारीख लिखकर उसे बाकि खतों के साथ दराज में रख देती। अब पृथ्वी की यादे उसे उदास नहीं करती थी बल्कि वह पृथ्वी के साथ बिताये अच्छे वक्त को याद करती।
पृथ्वी अब पहले से काफी बेहतर हालत में था। उसकी कलाई और पैर का प्लास्टर खुल चुका था और वह थोड़ा थोड़ा घर से बाहर सोसायटी में भी जाने लगा था। डॉक्टर ने उसे पैदल चलने को कहा और शाम में पृथ्वी वही सोसायटी में चहलकदमी करता , उदासी अब भी उसके चेहरे पर जमी रहती और वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता। एक शाम यू ही चहलकदमी करते हुए पृथ्वी उदास सा अवनि के बारे में सोचते हुए चला जा रहा था कि तभी नकुल उसके सामने चला आया तो पृथ्वी रुक गया और उदास आँखों से नकुल को देखने लगा।
पृथ्वी को ऐसे देखकर नकुल को बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था उसने कहा,”तुम ठीक हो ना पृथ्वी ?”
“हम्म्म,,,,,,,,,!!”,पृथ्वी ने धीरे से कहा
“तो फिर अपना ये हाल क्यों बना रखा है ? ना किसी से बात करते हो , ना ग्राउंड में आते हो आई नो अभी खेल नहीं सकते लेकिन सबको खेलते देख तो सकते हो ना , मुस्कुराना तो जैसे छोड़ ही चुके हो , तुम अवनि से मिलने राजस्थान गए थे ना क्या हुआ वहा ? देखो पृथ्वी अब तक मैंने तुमसे कुछ नहीं पूछा लेकिन अब मैं खुद को और नहीं रोक सकता , प्लीज बताओ मुझे क्या हुआ था ? तुम , तुम अवनि से मिले थे ना ?”
नकुल की बात सुनकर पृथ्वी ने उसे एक नजर देखा और वही पास पड़ी बेंच पर आ बैठा। नकुल पृथ्वी का सबसे अच्छा दोस्त था और पृथ्वी ने अवनि के बारे में सबसे पहले उसे ही बताया था इसलिए पृथ्वी ने सब बातें उसे बता दी। नकुल ने सुना तो उसे भी पृथ्वी के हालात जानकर बहुत दुःख हुआ और बुरा भी लगा लेकिन नकुल इस बात को समझता था कि पृथ्वी के घरवाले अवनि को स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए उसने कहा,”पृथ्वी तू उस भूल जा यार , हो सकता है वो तेरी किस्मत में ना हो,,,,,,,,,,!”
पृथ्वी ने नकुल की तरफ देखा और गुस्से से तकलीफभरे स्वर में कहा,“झूठ कहते है सब कि वो मेरी किस्मत में नहीं है , अरे ! अगर वो मेरी किस्मत में नहीं है तो फिर मैं उस से मिला ही क्यों ? इतनी बड़ी दुनिया में मुझे सिर्फ उस से ही मोहब्बत क्यों हुई ? 18 लड़कियों को शादी के लिए ना बोलने के बाद जब उसे पहली बार देखा तो क्यों उसके साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताने का दिल किया ? क्योकि वो सिर्फ मेरे लिए बनी है और अगर वो मेरी किस्मत में नहीं है तो मैं इस किस्मत को बदल कर रहूंगा क्योकि किस्मत के भरोसे जानवर जीते है , इंसान नहीं,,,,,,,!!”
पृथ्वी ने इतना कहा और उठकर वहा से चला गया। नकुल में उसे रोकने की हिम्मत नहीं थी क्योकि वह पृथ्वी के होंठो से निकले एक एक शब्द का दर्द महसूस कर रहा था। जाते जाते पृथ्वी लड़खड़ाया पर खुद को सम्हाल लिया। नकुल उदास आँखों से उसे जाते हुए देखता रहा,,,,,,,,,पृथ्वी की जिंदगी में ऐसा दौर भी आएगा नकुल ने कभी सोचा नहीं था।
( आखिर क्यों मिटा रहा है पृथ्वी हर रोज कैलेंडर पर छपी तारीखे , क्या है इनके पीछे की वजह ? क्या अवनि भूल पायेगी पृथ्वी को या उसकी यादों को बना लेगी अपने जीने की वजह ? क्या पृथ्वी बदल पायेगा अपनी किस्मत , क्या तोड़ देगा वो लता की दी कसम ? जानने के लिए पढ़ते रहिये “पसंदीदा औरत” मेरे साथ )
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संजना किरोड़ीवाल


Sad to h par bahot acha part h and next
Chalo koi to hai jisko Prithvi k dukh ka ehsaas hai, nhi to sab k sab Prithvi k peeche pade huye hai aur usko bura bhala bol rahe hai…aur Avni uski zindagi hee puri tarah badal gai hai…kaha wo Prithvi ko khud se door krne ko bol rhi thi, aur kaha ab wo khud uske pyar m pad gai…jab wo usse juda hui…1 maheena hone ko aaya hai…but dono m mail k jariye bhi koi baat nhi hai…dono pakke jo hai wada nibhane m…dono hee muskurana bool gaye hai…lakin aaj Prithvi ne ek umeed dee hai ki wo Avni ko khud se door nhi Jane dega…lakin wo apne ghar walo ko kaise manayega…aur Avni kya ho gai hai wo… Avni k liye dukh hai bahut zyada… thank god ki uske pass Surbhi hai
Next chapter pls
Next part plzz